
आप अपने बच्चों को रोजाना खेलने के लिए पार्क आदि में ले जाते हैं तो यह बहुत अच्छी बात है क्योंकि हाल ही में हुए एक शोध में पाया गया है कि पार्क के आस-पास खेलने वाले बच्चे बेहतर और तेज परफॉर्म करते हैं। शोध के अनुसार ग्रीन स्पेस मिलने से बच्चों में सहयोग की भावना का विकास होता है और वे दूसरों के साथ बेहतर मेल-जोल स्थापित कर पाते हैं।
इससे उनकी फिजिकल एक्टिविटीज में इजाफा होता है और वे फिट बने रहते हैं। ऐसा नियमित रूटीन बने रहे तो उनकी पूरी बॉडी का विकास अच्छी तरह से हो पाता है। इस तरह से अगर आप भी अपने बच्चे की बढिय़ा परवरिश चाहते हैं तो उनके डेली रूटीन में रोजाना एक से दो घंटे का पार्क जाना जरूर रखें।
मसल्स का प्रयोग कर पाते हैं
जो भी बच्चे पार्क में खेलने के लिए आते हैं, वे अपनी मांसपेशियों का पूरी तरह से प्रयोग कर पाते हैं। ऐसा घर में वीडियो गेम खेलने या फिर टीवी देखने के दौरान नहीं हो पाता है। इससे उनकी हड्डियां मजबूत होती हैं और किसी तरह की चोट आदि का उन पर ज्यादा प्रभाव नहीं होता। चोट आदि लगने पर वह स्कूल आदि से कम ही छुट्टियां ले पाते हैं। जिससे उनका स्कूल में परफॉर्मेंस भी बढिय़ा रहता है। वह स्कूल की एक्टिविटीज में भी भाग लेना काफी पसंद करते हैं।
दिमाग पर पड़ता है असर
बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फोर ग्लोबल हेल्थ के एक्सपर्ट डॉ. पेयम डेडवंद के अनुसार एक पार्क के पास बढ़ते हुए बच्चों के ध्यान में इजाफा हो जाता है। इससे वे बेहतर और तेज प्रदर्शन करते हैं। शहरों में ग्रीन रिक्त स्थान सामाजिक कनेक्शन और शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा देने, वायु प्रदूषण और शोर के जोखिम को कम करने का काम करता है। यह ग्रीन स्पेस भविष्य की पीढिय़ों के दिमाग के विकास के लिए आवश्यक है। पार्क का वातावरण युवाओं के दिमागों के विकास पर भी सीधे प्रभाव डालता है। इसलिए माता-पिता को बच्चों को खासतौर पर पार्क आदि में लेकर जाना चाहिए।
सेल्फ रेगुलेशन
पार्क एक ऐसी जगह होती है जहां बच्चे को पेड़-पौधों से फ्रेश एयर के अलावा, झूले, खेलने वाले दोस्त और अपनी एक्टिविटीज में मिट्टी, घास, पेड़, फूलों, ईटों आदि को छूने का मौका मिल जाता है। इससे बच्चा अपनी बॉडी को सेल्फ रेगुलेट करना सीखता है। उसके अंदर चोट, दर्द आदि को टॉलरेट करने का भाव बढ़ जाता है।
रिस्क लेना आएगा
अगर आपका बच्चा पार्क में जाता है तो वह तय कर पाता है कि वह किसी झूले पर कितना जा सकता है, कितनी ऊंची कूद कर पाता है, कितनी रस्सी कूद लेता है, कितना दौड़ पाता है। ये सारी गतिविधियां आपके बच्चे को रिस्क लेने और नए अवसर को समझने का मौका देने का काम करती हैं।
कॉन्फिडेंस बढ़ेगा
पार्क जाने वाले बच्चों में अलग ही कॉन्फिडेंस होता है क्योंकि वह न केवल वहां हर तरह के बच्चों से मिलते हैं बल्कि उनके माता-पिता से भी बातचीत करते हैं। पार्क जाने से बच्चे में खुशी का भाव आता है क्योंकि उसे वहां खेलने को मिलता है। इस तरह से वह डिप्रेशन आदि से दूर रहकर अपने स्कूल में अच्छा परफॉर्म कर पाता है और हेल्दी लाइफ जीता है।

Published on:
18 Mar 2018 02:38 pm
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