विचार मंथन : प्रपंच की माया जादुई है, इसके सम्मोहक-आकर्षण से बिरले ही बच पाते हैं- डॉ प्रणव पंड्या

विचार मंथन : प्रपंच की माया जादुई है, इसके सम्मोहक-आकर्षण से बिरले ही बच पाते हैं- डॉ प्रणव पंड्या

Shyam Kishor | Publish: Mar, 08 2019 05:16:24 PM (IST) | Updated: Mar, 08 2019 05:16:25 PM (IST) धर्म और आध्यात्मिकता

प्रपंच की माया जादुई है, इसके सम्मोहक-आकर्षण से बिरले ही बच पाते हैं- डॉ प्रणव पंड्या

प्रपंच की माया जादुई है । इसके सम्मोहक-आकर्षण से बिरले बच पाते हैं । ज्यादातर इसमें उलझकर भ्रमित होते हैं । उन्हें पता भी नहीं चल पाता कि वे भ्रम में भटके हुए हैं । जीवन के बहुमूल्य क्षणों को खो रहे हैं, जीवन लक्ष्य से दूर हो रहे हैं । प्रपंच की मायावी मुस्कानों में, इससे उपजे हंसी ठहाकों में जीवन ठगा जाता है । जिन्दगी की उजली सम्भावनाएँ कब पतन के अंधेरों में समा जाती हैं, पता ही नहीं चलता ।


इसकी पहचान आसान नहीं है । परचर्चा से इसकी शुरुआत होती है । परनिन्दा का रस इसमें घुलने से इसके नशे का नशीलापन गाढ़ा, मायावी और जादुई बनता है । परचर्चा और परनिन्दा का घुला-मिला रूप ही प्रपंच है। इसकी मायावी चकाचौंध में सबसे पहले जीवन की विवेक दृष्टि खोती है । जीवन लक्ष्य की स्मृति विलीन होती है । फिर अनायास ही द्वेष दुर्मति एवं दुर्बुद्धि पनप जाते हैं । इसके मायावी जादू से मित्र, शत्रु नजर आते हैं और भटकाने वाले प्रपंची जन सगे-सम्बन्धी लगने लगते हैं ।


प्रपंच के अंकुर कभी भी, कहीं भी, किसी में भी फूट निकलते हैं। बस इसके विषय बीजों के लिए परचर्चा और परनिन्दा का खाद-पानी चाहिए । इसकी विषवल्लरी के उपजते, पनपते और पल्लवित होते ही व्यक्ति आत्मविमुख व ईश्वर विमुख हो जाता है । अन्तःकरण में इसके जन्मते ही ईश्वर और आत्मा केवल दो शब्द बनकर रह जाते हैं। इनका अर्थ खो जाता है । प्रपंच की इस माया में सामान्य जन ही नहीं, साधक भी उलझकर भ्रमित होते और भटकने लगते हैं ।


उनकी साधना बातों और कर्मकाण्ड तक सिमट जाती है । साधना की आकृति फलती-फूलती रहती है, पर उसकी प्रकृति के प्राण प्रंपच चूसता रहता है । इन साधकों की ऐसी स्थिति के बारे में सन्त कवियों ने कहा है- ‘ब्रह्मज्ञान बिनु बात न करहीं । परनिन्दा करि विष रस भरही ॥’ ब्रह्मज्ञान के बिना कोई बात नहीं करते, लेकिन अन्तःकरण को परनिन्दा के विष रस से भरते रहते हैं । इनका उद्धार वेदान्त वचनों को पढ़ने, सुनने और प्रवचन करने से नहीं, प्रपंच के मायापाश से छूटने में है । सन्त कवि तुलसी के वचनों में सभी के लिए सीख है- ‘परचर्चा, परनिन्दा तजि, भजुहरि’ अर्थात् परचर्चा और परनिन्दा को छोड़कर हरि को भजो । तभी प्रपंच की जादुई माया से छुटकारा मिलेगा। मोक्ष की तात्त्विक अनुभूति होगी ।

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