विचार मंथन : स्वाधीनता पाने और अन्याय से मुक्ति के लिए बिरले ही आगे आते है- गुरू गोविन्दसिंह

विचार मंथन : स्वाधीनता पाने और अन्याय से मुक्ति के लिए बिरले ही आगे आते है- गुरू गोविन्दसिंह

स्वाधीनता पाने और अन्याय से मुक्ति के लिए बिरले ही आगे आते है- गुरू गोविन्दसिंह

गुरु गोविन्दसिंह ने एक ऐसा ही नरमेध यज्ञ किया । उक्त अवसर पर उन्होंने घोषणा की-"भाइयो, देश की स्वाधीनता पाने और अन्याय से मुक्ति के लिए चण्डी बलिदान चाहती है, तुम में से जो अपना सिर दे सकता हो, वह आगे आये । गुरु गोविन्दसिंह की मांग का सामना करने का किसी में साहस नहीं हो रहा था, तभी दयाराम नामक एक युवक आगे बढ़ा । " गुरु उसे एक तरफ ले गये और तलवार चला दी, रक्त की धार बह निकली, लोग भयभीत हो उठे । तभी गुरु गोविन्दसिंह फिर सामने आये और पुकार लगाई अब कौन सिर कटाने आता है । एक-एक कर क्रमश: धर्मदास, मोहकमचन्द, हिम्मतराय तथा साहबचन्द आये और उनके शीश भी काट लिए गये । बस अब मैदान साफ था कोई आगे बढ़ने को तैयार न हुआ ।

 

गुरुगोविंद सिंह के पंचप्यारे

स्वाधीनता पाने और अन्याय से मुक्ति के लिए बिरले ही आगे आते है-
गुरु गोविन्दसिंह अब उन पाँचों को बाहर निकाल लाये । विस्मित लोगों को बताया यह तो निष्ठा और सामर्थ्य की परीक्षा थी, वस्तुत: सिर तो बकरों के काटे गये । तभी भीड़ में से हमारा बलिदान लो-हमारा भी बलिदान लो की आवाज आने लगी । गुरु ने हँसकर कहा-"यह पाँच ही तुम पाँच हजार के बराबर है । जिनमें निष्ठा और संघर्ष की शक्ति न हो उन हजारों से निष्ठावान् पाँच अच्छे?'' इतिहास जानता है इन्हीं पाँच प्यारो ने सिख संगठन को मजबूत बनाया । जो अवतार प्रकटीकरण के समय सोये नहीं रहते, परिस्थिति और प्रयोजन को पहचान कर इनके काम में लग जाते है, वे ही श्रेय-सौभाग्य के अधिकारी होते हैं, अग्रगामी कहलाते है ।

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