विचार मंथन : मंदिर की गंभीर उदासी को देख भगवान भी दिखावा करने वाले पुजारी को भूल जाते हैं- रविन्द्रनाथ टैगोर

विचार मंथन : मंदिर की गंभीर उदासी को देख भगवान भी दिखावा करने वाले पुजारी को भूल जाते हैं- रविन्द्रनाथ टैगोर

मंदिर की गंभीर उदासी को देख भगवान भी दिखावा करने वाले पुजारी को भूल जाते हैं- रविन्द्रनाथ टैगोर

मौत प्रकाश को ख़त्म करना नहीं

सिर्फ तर्क करने वाला दिमाग एक ऐसे चाक़ू की तरह है जिसमें सिर्फ ब्लेड है यह इसका प्रयोग करने वाले के हाथ से खून निकाल देता है। कट्टरता सच को उन हाथों में सुरक्षित रखने की कोशिश करती है जो उसे मारना चाहते हैं। पंखुडियां तोड़ कर आप फूल की खूबसूरती नहीं इकठ्ठा करते। मौत प्रकाश को ख़त्म करना नहीं है; ये सिर्फ दीपक को बुझाना है क्योंकि सुबह हो गयी है। मित्रता की गहराई परिचय की लम्बाई पर निर्भर नहीं करती। किसी बच्चे की शिक्षा अपने ज्ञान तक सीमित मत रखिये, क्योंकि वह किसी और समय में पैदा हुआ है।

 

जो कुछ हमारा है वो हम तक आता है

मिटटी के बंधन से मुक्ति पेड़ के लिए आज़ादी नहीं है। हर बच्चा इसी सन्देश के साथ आता है कि भगवान अभी तक मनुष्यों से हतोत्साहित नहीं हुआ है। हर एक कठिनाई जिससे आप मुंह मोड़ लेते हैं, एक भूत बन कर आपकी नीद में बाधा डालेगी। जो कुछ हमारा है वो हम तक आता है, यदि हम उसे ग्रहण करने की क्षमता रखते हैं। तथ्य कई हैं पर सत्य तो केवल एक है। आस्था वो पक्षी है जो सुबह अंधेरा होने पर भी उजाले को महसूस करती है।

 

जो अच्छाई करने में बहुत ज्यादा व्यस्त है

मंदिर की गंभीर उदासी से भागकर बच्चें बाहर धूल में खेलने लगे और भगवान उन्हें खेलता देख दिखावा करने वाले पुजारी को भूल जाते है। वो जो अच्छाई करने में बहुत ज्यादा व्यस्त है, स्वयं अच्छा होने के लिए समय नहीं निकाल पाता। मैं एक आशावादी होने का अपना ही संस्करण बन गया हूं। यदि मैं एक दरवाजे से नहीं जा पाता तो दुसरे से जाऊंगा- या एक नया दरवाजा बनाऊंगा। वर्तमान चाहे जितना भी अंधकारमय हो कुछ शानदार सामने आएगा। मैं सोया और स्वप्न देखा कि जीवन आनंद है, मैं जागा और देखा कि जीवन सेवा है, मैंने सेवा की और पाया कि सेवा आनंद है। यदि आप सभी गलतियों के लिए दरवाजे बंद कर देंगे तो सच बाहर रह जायेगा।

 

दिन पर दिन जाते मैं बैठा एकाकी ।

दिन पर दिन चले गए,पथ के किनारे
गीतों पर गीत, अरे, रहता पसारे ।।
बीतती नहीं बेला, सुर मैं उठाता ।
जोड़-जोड़ सपनों से उनको मैं गाता ।।
दिन पर दिन जाते मैं बैठा एकाकी ।
जोह रहा बाट, अभी मिलना तो बाकी ।।
चाहो क्या, रुकूं नहीं, रहूं सदा गाता ।
करता जो प्रीत, अरे, व्यथा वही पाता ।

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