14 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

विचार मंथन : ब्रह्म, जीव और जगत तीनों सत्य हैं- रामानुजाचार्य

विचार मंथन : ब्रह्म, जीव और जगत तीनों सत्य हैं- रामानुजाचार्य

2 min read
Google source verification

भोपाल

image

Shyam Kishor

May 10, 2019

daily thought

विचार मंथन : ब्रह्म, जीव और जगत तीनों सत्य हैं- रामानुजाचार्य

यदि ब्रह्म एक विशिष्ट है, जिसमें जीव और जगत् विशेषण रूप से स्थित हैं। ब्रह्म आत्मा या केन्द्रीभूत तत्व है। जीव और जगत् ब्रह्म के देह हैं। ब्रह्म, जीव और जगत् तीनों सत्य हैं, भिन्न हैं, परन्तु केवल ब्रह्म स्वाधीन है तथा जीव और जगत् ब्रह्मधीन एवं ब्रह्म नियंत्रित हैं। जीव और जगत् किस अर्थ में ब्रह्म के देह हैं।

'देह वह द्रव्य है, जिसे एक चेतन आत्मा अपने प्रयोजन हेतु धारण करती है, नियंत्रित करती है, कार्य में प्रवृत्त करती है और जो पूर्णतया उस आत्मा के अधीनस्थ रहती है। इस दृष्टि से समस्त जीव-जगत् ब्रह्म के देह हैं, क्योंकि वे ब्रह्म पर आधारित, ब्रह्म के द्वारा नियंत्रित एवं ब्रह्म के अधीनस्थ रहते हैं। ब्रह्म और जीव-जगत् के इस विशिष्ट संबंध को रामानुज अपृथक्सिद्ध के नाम से पुकारते हैं, जिसमें पूर्ण तादात्म्य और पूर्ण भेद दोनों का निषेध किया गया है। इसमें संबंधियों के तादात्म्य पर ज़ोर तो दिया ही गया है, पर यह तादात्म्य संबंध और फलत: किसी एक संबंधी को ही समाप्त न कर दे, इस दृष्टि से भेद पर भी बल देकर संबंध के अस्तित्व की रक्षा की गई है।

जगत की तात्विक प्रस्थिति के बारे में वेदान्त दर्शन में मायावाद एवं लीलावाद की दो पृथक् एवं पूर्णत: विरोधी परम्पराएं रही हैं। इन दोनों परम्पराओं में मौलिक भेद सत्ता के प्रति दृष्टिकोण में है। दोनों यह मानते हैं कि सृष्टि प्रक्रिया का मूल सृजन की चाह है और उस चाह को चरमतत्व (ब्रह्म) पर आरोपित एवं मिथ्या माना गया है, जबकि लीलावाद में उसे ब्रह्म की स्वाभाविक शक्ति एवं वास्तविक माना गया है। दोनों के अनुसार जगत् ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है, पर एक में वह आभास मात्र है, जबकि दूसरे में वास्तविक। रामानुज जगत् को उतना ही वास्तविक मानते हैं, जितना की ब्रह्म है। ब्रह्म जगत की सृष्टि का निमित्त एवं उपादान कारण है। किन्तु इस प्रक्रिया में ब्रह्म निर्विकार रहता है।

क्रिया शक्ति उसकी सत्ता या स्वरूप में बाधा नहीं पहुँचाती। प्रलय की अवस्था में चित् और अचित् अव्यक्त रूप में ब्रह्म में रहते हैं। ब्रह्म को इस अवस्था में 'कारण-ब्रह्म' कहते हैं। जब सृष्टि होती है, तब ब्रह्म में चित् एवं अचित् व्यक्त रूप में प्रकट होते हैं। इस अवस्था को कार्य ब्रह्म कहते हैं। ब्रह्म अपनी दोनों विशिष्ट अवस्थाओं में अद्वैत रूप है। केवल भेद यह है कि पहले में अद्वैत एकविध है तो दूसरे में अनेकविध हो जाता है। दोनों अवस्थाएं समान रूप से सत्य हैं। अभेद-श्रुतियां कारण-ब्रह्म की बोधक हैं और और भेद-श्रुतियां कार्य-ब्रह्म की।