
विचार मंथन : आत्मावलम्बी किसी अनुग्रह, वरदान की प्रतीक्षा नहीं करते, न ही याचना। वरन् प्रगति का पथ स्वयं बनाते हैं- संत कबीर
एक लकड़हारा जंगल से लकड़ी काटकर किसी प्रकार दु:ख और कष्ट सहते हुए अपने दिन व्यतीत करता था। एक दिन वह जंगल से पतली-पतली लकड़ी सिर पर ला रहा था की अकस्मात् कोई मनुष्य उसी रास्ते सें जाते-जाते उसे पुकार कर बोला- "बच्चा, आगे बढ़ जा।'' दूसरे दिन वह लकड़हारा उस मनुष्य की बात याद कर कुछ आगे बढ़ा तो मोटी- मोटी लकड़ियों का जंगल उसको दीख पड़ा। उस दिन उससे जहाँ तक बना लकड़ी काट लाया और बाजार में बेचकर उसने पहले दिन से अधिक पैसा कमाया।
तीसरे दिन फिर मन में विचार करने लगा- उस महात्मा ने तो मुझे आगे बढ जाने 'को कहा था। भला आज और थोड़ा आगे बढ़कर तो 'देखूं। यह सोचकर वह आगे बढ़ गया और उसे एक चन्दन का वन दिखाई पड़ा। उस दिन उसने चन्दन की लकड़ी बेचकर बहुत रुपये कमाये। दूसरे दिन उसने फिर मन में विचार किया कि मुझे तो उन्होंने आगे ही जाने को कहा है, यह विचार कर और आगे जाकर उस दिन उसने तांबे की खान पाई। वह यहां पर न रुककर प्रतिदिन आगे ही बढ़ता गया, और क्रमश: चांदी, सोने और हीरे की खान पाकर बड़ा धनवान् हो गया। धर्म मार्ग में भी इसी प्रकार होता है।
आत्मिक क्षेत्र में आदमी को कभी भी रुकना नहीं चाहिए। उस साधु ने जो आगे बढ़ने की शिक्षा दी थी, उसका मर्म था- रुक मत, चलता जा, जब तक गन्तव्य तक न पहुंच जाय। अपने अन्दर झाँक व तब तक आत्मावलोकन, विश्लेषण, मनन कर जब तक प्रगति की राह न दिखाई पड़े। थोड़ी- बहुत ज्योति आदि का दर्शन कर यह मत समझो कि तुम्हें सिद्धि मिल गयी, मोक्ष प्राप्त हो गया।
कस्तूरी कुण्डल बसे, मृग दूंढ़े वन मांहि। ऐसे सट- सट राम हैं, दुनियां देखे नांहि।
तेरा साईं तुझ्झ में, जस पुहुपन में वास। कस्तूरी का हिरण ज्यों, फिर- फिर ढूंढ़त घास।
आत्मावलम्बी किसी अनुग्रह, वरदान की प्रतीक्षा नहीं करते, न ही याचना। वरन् प्रगति का पथ स्वयं बनाते है, अपनी सहायता आप करते हैं।
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Published on:
23 Oct 2019 05:43 pm
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