
विचार मंथन : अनाथ से भी अनाथ हूँ मैं, मेरा घर देखों टूटा-फूटा झोंपड़ा है लेकिन मेरी आज्ञा तीनों लोक मानते हैं, रिद्धि-सिद्धि मेरी दासी है- संत तुकाराम
जब महान संत तुकाराम ने छत्रपति शिवाजी की जिज्ञासा का समाधान किया...अद्भूत, संत तो होते ही ऐसे.. स्वयं परमात्मा सदगुरू, संत के रूप में इस धरा परा आते हैं..
एक दिन प्रभात काल में कुछ ब्राह्मण और एक विशाल फौज के लेकर शिवाजी महाराज अपने गुरुदेव समर्थ स्वामी रामदास के चरणों में दर्शन व सत्संग के हेतु पहुँचे । संत-सानिध्य में घण्टे बीत गये इसका पता ही न रहा। दोपहर के भोजन का समय हो गया । आखिर शिवाजी उठे । श्रीचरणों में प्रणाम किया और विदा माँगी। समर्थ ने कहाः "सब लोग भूखे हैं, भोजन करके जाओ ।
शिवाजी भीतर सोचने लगेः "इतनी बड़ी फौज का भोजन कोई भी पूर्व आयोजन के बिना कैसे होगा? समय भी नहीं है और सीधा-सामान भी नहीं है । स्वामी समर्थ ने अपने शिष्य कल्याण गोसांई को भोजन का प्रबन्ध करने की आज्ञा दे दी । वह भी विस्मित नयनों से गुरुदेव के मुखमण्डल को देखता ही रह गया । पूर्व सूचना के बिना इतने सारे लोगों की रसोई बनाई नहीं थी । स्वामीश्री उन लोगों की उलझी हुई निगाहें समझ गये और बोले- "वत्स ! वह देख...
पर्वत में जो बड़ा पत्थर खड़ा दिखता है न, उसको हटाना । एक गुफा का द्वार खुलेगा । उस गुफा में सब माल तैयार है । कल्याण गोसांई ने जाकर पत्थर को हटाया तो गुफा के भीतर गरमागरम विभिन्न पकवान व व्यञ्जनों के भरे खमूचे देखे । प्रकाश के लिए जगह-जगह पर मशालें जल रही थीं । शिवाजी महाराज सहित सब लोग दंग रह गये । यथेष्ट भोजन हुआ । फिर स्वामी जी के समक्ष शिवाजी महाराज ने पूछा- हे प्रभो ! ऐसे अरण्य में इतने सारे लोगों के भोजन की व्यवस्था आपने एकदम कैसे कर दी? कृपा करके अपनी यह लीला हमें समझाओ, गुरुदेव । इसका रहस्य जाकर तुकोबा से पूछना । वे बताएँगे । मंद मंद मधुर स्मित के साथ समर्थ ने कहा- महाराज जी ! हमारे गुरुदेव स्वामी समर्थ के यहाँ भी भोजन का ऐसा सुन्दर प्रबन्ध हुआ था। मैंने रहस्य पूछा तो उन्होंने आपसे मर्म जानने की आज्ञा दी । कृपया अब आप हमारी जिज्ञासा का समाधन करें..
संत तुकाराम जी बोले.. हे शिवा, अज्ञान से मूढ़ हुए चित्तवाले देहाभिमानी लोग इस बात को नहीं समझते कि स्वार्थ और अहंकार त्याग कर जो अपने आत्मदेव विठ्ठल में विश्रान्ति पाते हैं उनके संकल्प में अनुपम सामर्थ्य होता है । रिद्धि-सिद्धि उनकी दासी हो जाती है । सारा विश्व संकल्प का विलास है । जिसका जितना शुद्ध अन्तःकरण होता है उतना उसका सामर्थ्य होता है । अज्ञानी लोग भले समर्थजी में सन्देह करें लेकिन समर्थ जी तो समर्थ तत्त्व में सदा स्थिर हैं । उसी समर्थ तत्त्व में सारी सृष्टि संचालित हो रही है । सूरज को चमक, चन्दा को चाँदनी, पृथ्वी में रस, फूलों में महक, पक्षियों में गीत, झरनों में गुंजन उसी चैतन्य परमात्मा की हो रही है । ऐसा जो जानता है और उसमें स्थित रहता है उसके लिए यह सब खिलवाड़ मात्र है ।
शिवाजी ! सन्देह मत करना । मनुष्य के मन में अथाह शक्ति व सामर्थ्य भरा है, अगर वह अपने मूल में विश्रान्ति पावे तो । स्वामी समर्थ क्या नहीं कर सकते ? मैं तो एक साधु हूँ, हरि का दास हूँ, अनाथ से भी अनाथ हूँ । मेरा घर देखो तो टूटा-फूटा झोंपड़ा है लेकिन मेरी आज्ञा तीनों लोक मानते है । रिद्धि-सिद्धि मेरी दासी है । साधुओं का माहात्म्य क्या देखना? उनके विषय में कोई सन्देह नहीं करना चाहिए ।
"रिद्धि-सिद्धि दासियाँ है, कामधेनु घर में है लेकिन मुझे खाने के लिए रोटी का टुकड़ा भी नहीं है । गद्दी-तकिये पलंग आदि वैभव है लेकिन मुझे पहनने के लिए लंगोट का चीथड़ा भी नहीं है । यदि पूछो तो वैकुंठ में मेरा वास है यह हकीकत है लेकिन यहाँ तो मुझे रहने के लिए जगह नहीं है । तुकाराम कहते हैं कि हम हैं तो वैकुण्ठ के राजा लेकिन किसी से हमारा गुजारा नहीं हो सकता ।
Published on:
06 Oct 2018 06:31 pm
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