तुम अपने से पूछो- कोऽहम्? मैं कौन हूं : स्वामी विवेकानंद

तुम अपने से पूछो- कोऽहम्? मैं कौन हूं : स्वामी विवेकानंद

By: Shyam

Published: 03 Jan 2020, 05:20 PM IST

सद्गुरु के मुख में ब्रह्म का वास होता है। उनकी वाणी ब्रह्म वाणी है। उनके द्वारा बोले गए वचन ब्रह्म वाक्य हैं। महान् दार्शनिक योगी भगवान् शंकराचार्य ने कहा है- मंत्र वही नहीं है, जो वेद और तन्त्र ग्रन्थों में लिखे हैं। मंत्र वे भी हैं, जिन्हें गुरु कहते हैं। सद्गुरु के वचन महामंत्र हैं। इनके अनुसार साधना करने वाला जीवन के परम लक्ष्य को पाए बिना नहीं रहता। पतिव्रता स्त्री की भांति मन, वाणी और कर्म की सम्पूर्ण निष्ठा को नियोजित करके गुरुदेव भगवान् का ध्यान करना चाहिए। भावना हो या चिन्तन अथवा फिर क्रिया, सभी कुछ सम्मिलित रूप से एक ही दिशा में- सद्गुरु के चरणों की ओर प्रवाहित होना चाहिए।

 

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ध्यान रहे इस महासाधना में अपना कोई बड़प्पन आड़े न आए। अपना कोई क्षुद्र स्वार्थ इसमें बाधा न बने। श्री रामकृष्ण देव कभी-कभी हंसते हुए अपने भक्तों से कहते थे- कुछ ऐसे हैं, जिनके मन में तो भगवान् के प्रति और गुरु के प्रति भक्ति है; परन्तु उन्हें लाज लगती है, शरम आती है कि लोग क्या कहेंगे? आश्रम एवं कुल की झूठी मर्यादा, अपनी जाति का अभिमान, यश-प्रतिष्ठा का लोभ उन्हें गुरु की सेवा करने में बाधा बनता है। परमहंस देव जब यह कह रहे थे, तो उनके एक भक्त शिष्य मास्टर महाशय ने पूछा, तो फिर मार्ग क्या है? परमहंस देव ने कहा—इन सबको छोड़ दो, त्यागो इन्हें, तिनके की तरह। सद्गुरु की आज्ञापालन में जो भी बाधाएं सामने आएं, उनका सामना करने में कभी कोई संकोच नहीं करना चाहिए।

 

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तुम अपने से पूछो- कोऽहम्? मैं कौन हूं? देखो तुम्हें क्या उत्तर मिलता है। हो सकता है तुम्हें उत्तर मिले मैं पुत्र हूं, पिता हूं, पति हूं अथवा पत्नी हूं, माँ हूं, पुत्री हूं। ऐसे उत्तर मिलने पर और गहराई में उतरो- गुरुचरणों में और ज्यादा नेह बढ़ाओ। फिर तुम्हें एक और सिर्फ एक उत्तर मिलेगा- ‘शिष्योऽहम्’ मैं शिष्य हूँ। सारे रिश्ते-नाते इस एक सम्बन्ध में विलीन हो जाएंगे। ध्यान रहे जो शिष्य है, वही साधक हो सकता है। उसी में जीवन की समस्त सम्भावनाएं साकार हो सकती हैं और जो सच्चा शिष्य है- उसके सभी कर्त्तव्य अपने गुरु के लिए हैं। ऐसे कर्त्तव्यनिष्ठ शिष्य को ही अपने सद्गुरु की कृपा फलीभूत होती दिखाई देती है।

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