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समुद्र मंथन से निकले थे 14 रत्न, उन्हीं में से एक हैं भगवान धन्वंतरि

आयुर्वेद विज्ञान की उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय हुई। समुद्र मंथन का वर्णन वाल्मिकी रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत पुराण, विष्णु पुराण आदि में प्राप्त होता है। कश्यप संहिता के रेवती कलाध्याय में अमृत प्राप्ति का वर्णण आया है। रामायण के अनुसार समुद्र मंथन से धर्मात्मा आयुवैदमय पुरुषदण्ड और कमण्डल के साथ प्रकट हुए।

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समुद्र मंथन से निकले थे 14 रत्न, उन्हीं में से एक हैं भगवान धन्वंतरि

आयुर्वेद विज्ञान की उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय हुई। समुद्र मंथन का वर्णन वाल्मिकी रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत पुराण, विष्णु पुराण आदि में प्राप्त होता है। कश्यप संहिता के रेवती कलाध्याय में अमृत प्राप्ति का वर्णण आया है। रामायण के अनुसार समुद्र मंथन से धर्मात्मा आयुवैदमय पुरुषदण्ड और कमण्डल के साथ प्रकट हुए। यथा -
ततो निश्चित्य मथनं योक्त्रं कृत्वा
च वासुकिम्।
मन्थानं मन्दरं कृत्वा ममन्थुरमितौजस।।
अर्थ: वर्षसहस्त्रेण आयुर्वेदमय: पुमान्।
उदतिष्ठत् सुधर्मात्मा सदण्ड: सकमण्डलु:।। (वा.का. 4.18)

इसी प्रकार का वर्णन महाभारत के आदिपर्व के 18वें अध्याय में भी आया है। इसके अनुसार समुद्र मन्थन में जो औषधियां समुद्र में डाली गयी थी, वे अमृत स्त्राव के रूप में निकली तथा धन्वंतरि अमृतयुक्त श्वेत कमण्डल धारण किए हुए प्रकट हुए।

धन्वन्तरिस्ततो देवो वपुष्मानुदतिष्ठत।
श्वेतं कमण्डलुं विभ्रदमृतं यत्र तिष्ठति।। (महा. आदि 18.53)

विष्णु पुराण में समुद्र मंथन की महिमा
छठे मनु का नाम चाश्रुष था। उन दिनों दुर्वासा के शाप से देवराज इन्द्र के साथ-साथ सारे देवतागण श्रीहीन हो गए थे। दैत्यों ने देवताओं को भगाकर उन्हें देवलोक से बाहर कर दिया था। निराश होने पर सब देवता मिलकर ब्रह्माजी के पास गए। ब्रह्माजी ने जब देखा कि इन्द्र, वायु आदि सभी देवता अत्यन्त कमजोर और श्रीहीन हो गए हैं तथा ये विकट परिस्थिति में पड़ गए हैं, उन्होंने भगवान का स्मरण किया। स्मरण से उन्हें बल मिला। शंकर आदि सभी देवाताओं को साथ लेकर वे भगवान विष्णु के वैकुण्ठधाम में गए, लेकिन उन्हें वहां कुछ दिखाई न पड़ा। दर्शन के लिए ब्रह्माजी ने लम्बी स्तुति की। इससे भगवान उनके बीच प्रकट हुए, किन्तु भगवान की इस छवि को केवल भगवान शंकर और ब्रह्माजी ही देख सके। ब्रह्माजी और देवताओं ने अपनी खराब परिस्थिति उनके सामने रखी। भगवान ने देवताओं को राय दी कि स्थिर लाभ के लिए तुम लोग दैत्यों से संधि कर लो, ताकि समुद्र मथंन हो सके। उस मंथन से हमें अमृत रूप औषधि निकालनी है। यह कार्य अकेले संभव नहीं है। उस दिव्य रस के उपयोग से तुम सभी बल से सम्पन्न हो जाओगे और मृत्यु के बाद फि र से जीवित हो उठोगे, तब दैत्यगण स्वयं आप सब पर आक्रमण करने से घबराएंगे। इसीलिए तुम लोग दैत्यों के साथ सम्पूर्ण औषधियां लाकर अमृत के लिए क्षीर सागर में डालो। इस मंथन से औषधियों का सारभूत अमृत आदि लोकोपकारक वस्तुएं निकल सकेंगी। इस मंथन में मन्दराचल को मथानी बनाया जाएगा और वासुकि नाग को नेति। इन सब उपकरणों को शीघ्र जुटाओ (विष्णु पुराण 1.9-7.6-80)।


इसके बाद देवताओं और दानवों ने नाना प्रकार की औषधियां लाकर क्षीर सागर में डाली और मंथन प्रारंभ किया। उस अमृत रूप औषधतत्त्व को प्राप्त करना इतना कठिन था कि केवल इन परिगणित साधनों से वह उपलब्ध नहीं हो सका। इसलिए भगवान विष्णु ने स्वयं कूर्मरूप धारण कर मन्दराचल के आधार स्वरूप बने, साथ ही अदृश्य रूप से एक अन्य विशाल रूप धारण कर उस पर्वत को ऊपर से ही दबा रखा था। भगवान ने देखा कि केवल देवताओं और असुरों की शक्ति से अमृत निकालना कठिन है तो स्वयं दैत्य का रूप धारण कर दैत्यों के दल में और देवताओं का रूप धारण कर देवताओं के दल में शामिल होकर मंथन किया और सम्पन्न कराया (विष्णु पुराण 1.9.88)।
औषधियों के मंथने से जो अमृत निकला वह मिश्रण अदृश्यभाव से देवताओं को प्राप्त कराया, अमृत लेकर देवताओं ने भगवान विष्णु के नामों का जाप प्रारंभ किया। आरोग्य के साधक औषधों के नाम का उच्चारण किया। तन्मयता से धन्वंतरि ने उस दिव्य औषध को निकाला।


किन्तु दैत्य ने अमृत के उस कलश को हथिया लिया। देवता विषाक्त से भर गए और फिर उन्होंने भगवान की शरण ली। भगवान विष्णु ने अपनी माया से दैत्यों को मोहित कर देवताओं को अमृत पिला दिया और स्वयं वैकुण्ठधाम चले गए। इस प्रकार देवताओं के सबल हो जाने पर सूर्य, ग्रह, नक्षत्रादि आकाश के गोलकों ने अपनी गति में नियमितता प्राप्त कर ली। संसार फि र सुखी एवं सम्पन्न होकर उल्लास से भर गया।


औषध का प्रयोग फिर जनता के महान पालक अश्विन कुमारों के हाथ में आ गया। बहुतकाल बाद मनुष्य लोक में जब रोगों का प्रसार होने लगा और पृथ्वी के प्राणी दीन-दुखी होने लगे, तब भगवान नारायण श्रीविष्णु ने अंशांश रूप में जो अपना अवतार धन्वन्तरि रूप में लिया था। उस धन्वन्तरि रूप से राजा धन्व के यहां पुत्र रूप में पाने के लिए तप किया था। गर्भावस्था में ही इन्हें अणिमा आदि सिद्धियां प्राप्त हो गई थी। विष्णु के अंशांश रूप में अवतीर्ण भगवान धन्वंतरि ने आयुर्वेद को आठ अंगों में विभाजित कर दिया। पौष शुक्ल दशमी को देवासुर संग्राम हुआ। उसमें 2 वर्ष 9 मास 10 दिन का समय लगा था और अंतिम समय में अमृतोंत्पत्ति के पश्चात अब्ज धन्वंतरि समुद्र के किनारे उत्पन्न हुए। उस समय कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी थी। इसी कारण तभी से मानव मात्र का रोग संकट से उद्धार करने के कारण धन्वन्तरि त्रयोदशी कार्तिक कृष्ण पक्ष को मनाई जाती है। समद्र मंथन पश्चिम समुद्र पर भृगु कच्छ के समीप हुआ था। वर्तमान काल में इस स्थान का नाम भरौंच है। यहीं पर भृगु ऋ षि का आश्रम भी था।

समुद्र मंथन से निकले ये रत्न
श्री, श्रीमणि, रम्भा, वारूणी, अभिय, शंख, गजराज। धनु, धन्वन्तरि, धेनु, शशि, कल्पद्रुम, विष, वाजि।।
भगवान धन्वंतरि ही आयुर्वेद को इस भूतल पर लेकर आए। आयुर्वेद का निरन्तर विकास पूर्व में उच्च शिखर पर था। आज आयुर्वेद पोषक कम हैं। क्योंकि राजकीय संरक्षण में भी आयुर्वेद के विकास की गति को धीमा बना रखा हैै।
एक समय ऐसा था कि महान सिकन्दर अपनी सेना की चिकित्सा के लिए, भारतीय वैद्यों को बड़े सम्मान के साथ ले गया था। ईरान के खलीफा हारू रशीद अपनी चिकित्सा के लिए भारतीय वैद्यों को रखते थे। अरस्तू और अफलातून जैसे हकीम भारत से आयुर्वेद सीखकर श्रेष्ठ चिकित्सक हुए। लेकिन आज उसी भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद को बढ़ाने की जरूरत है क्योंकि इसमें न केवल बीमारी का इलाज होता है बल्कि बीमार न हो इसके लिए भी बताया गया है। साथ ही आयुर्वेद विज्ञान पर नवीन शोध करने की आवश्यकता है। आज विश्व आयुर्वेद चिकित्सा को पुन: देख रहा है क्योंकि कैंसर, हेपेटाइटिस, एड्स जैसे गंभीर असाध्य रोग की दवा आयुर्वेद से ही प्राप्त हो सकती है। हमें इस खोज को देकर पुन: आयुर्वेद को स्थान दिलाना है। इसके लिए सबको साथ आना होगा। यह धन्वंतरि को याद करने का सर्वोत्तम तरीका होगा।
वैद्य पीयूष त्रिवेदी
आयुर्वेदाचार्य, जयपुर