
नई दिल्ली। रामायण और महाभारत रहस्स्यों से भरे हुए ग्रंथ हैं। इस तरह महाभारत की भी कई कहानियां प्रचलित हैं और उसके पीछे का रहस्य भी। यह कथा उस समय की है, जब युद्ध में पांडवों ने कौरवों पर विजय पाई थी और पांडव हस्तिनापुर में सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे रहे थे। धर्मप्रिय रजा युधिष्ठिर के राज्य में प्रजा को किसी भी चीज की कोई कमी नहीं थी। मान्यता अनुसार कि एक दिन देवऋषि नारद मुनि महाराज युधिष्ठिर के समक्ष प्रकट हुए और कहने लगे कि आप सभी पांडव यहां प्रसन्नतापूर्वक रह रहे हैं, लेकिन वहां स्वर्गलोक में आपके पिता बहुत दुखी हैं। देवऋषि के ऐसे वचन सुनकर युधिष्ठिर ने इसका कारण पूछा, तो देवऋषि ने कहा, 'वे अपने जीवित रहते रहते हुए राजसूय यज्ञ करवाना चाहते थे लेकिन ऐसा वे कर नहीं सके इसलिए दुखी हैं।
'अपने पिता की इच्छा को पूरा करने के लिए एक बार पांडवों ने राजसूय यज्ञ करने की योजना बनाई। आयोजन को भव्य बनाने के लिए युधिष्ठर ने यज्ञ में भगवान शिव के परम भक्त ऋषि पुरुष मृगा को आमंत्रित करने का फैसला किया। जैसा की आप जानते हैं ऋषि पुरुष मृगा का आधा शरीर पुरुष का था और पैर मृग के समान थे। उन्हें ढूंढने और बुलाने का जिम्मा भीम को सौंपा गया। वे कहां रहते थे यह किसी को पता नहीं था।
भीम अपने बड़े भाई की बात मान वह पुरुषमृगा की खोज में हिमालय की ओर चल दिए। रास्ते में वह हनुमान जी मिले और उनके पूछने पर भीम ने उन्हें पूरी बात बता दी। हनुमान ने कहा यह सच है कि पुरुषमृगा की गति बहुत तेज है। लेकिन उनकी गति धीमी करने का एक उपाय है। वह शिवजी के परम भक्त हैं इसलिए उनके रास्ते में शिवलिंग आए तो वह पूजा करने के लिए जरूर रुकेंगे। हनुमान ने भीम को अपने 3 बाल देकर कहा कि जब भी पुरुषमृगा तुम्हें पकड़ने लगे तब एक बाल गिरा देना। यह एक बाल 1000 शिवलिंगों में परिवर्तित हो जाएगा। पुरुषमृगा अपने स्वाभाव अनुसार हर शिवलिंग की पूजा करेंगे और तुम आगे निकल जाना।
भीम आज्ञा लेकर आगे बढ़े। कुछ दूर जाकर ही भीम को पुरुष मृगा मिल गए जो को भगवान महादेव की स्तुति कर रहे थे। भीम ने उन्हें प्रणाम किया और अपने आने का कारण बताया, इस पर ऋषि ने सशर्त जाने के लिए हां कर दी। पुरुषमृगा ने शर्त रखी कि भीम को उनसे पहले हस्तिनापुर पहुंचाना होगा और ऐसा ना कर पाने पर वह भीम को खा जाएंगे। भीम ने भाई की इच्छा को ध्यान में रखते हुए हां कर दी और हस्तिनापुर की तरफ दौड़ पड़े। जैसे ही पुरुषमृगा ने उनको पकड़ने की कोशिश की, तभी भीम ने हनुमान का एक बाल गिरा दिया और यह वास्तव में 1000 शिवलिंगों में बदल गया।
भगवान शिव के परमभक्त होने के कारण पुरुषुमृगा हर शिवलिंग को प्रणाम करने लगे और भीम भागते रहे। जब वो हस्तिनापुर के द्वार में घुसने ही वाले थे, तो पुरुषमृगा की पकड़ में उनके पैर आ गए। लेकिन जैसे ही पुरुषमृगा ने भीम को खाना चाहा, तभी श्री कृष्ण और युधिष्ठर वहां पहुंच गए। तब युधिष्ठर से न्याय करने को कहा गया। क्यूंकि उनका एक पैर महेल के अन्दर था और एक बहार और उन्होंने कहा कि चूंकि भीम के पांव द्वार के बाहर रह गए थे इसलिए पुरुषमृगा सिर्फ भीम के पैर ही खाने के हकदार हैं। ऐसा सुनकर युधिष्ठिर के न्याय से ऋषि पुरुष मृगा प्रसन्न हुए तथा उन्होंने भीम को जीवनदान दे दिया। इसके बाद ऋषि ने यज्ञ संपन्न करवाया और सबको आशीर्वाद भी दिया।
Published on:
23 Dec 2017 09:09 am
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