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Saraswati Chalisa: कला, साहित्य, संगीत, संतान सुख और हर परीक्षा में मिलती है सफलता!

Saraswati Chalisa Lyrics in Hindi, Basant Panchmi 2026: सरस्वती चालीसा और लाभ, यहां पढ़ें। पाठ से स्डूडेंट्स, सिंगर्स, साहित्य और शिक्षा से जुड़े लोगों की चमक उठती है किस्मत।

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भारत

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Adarsh Thakur

Jan 23, 2026

Saraswati Chalisa Lyrics in hindi basant panchmi 2026

Saraswati Chalisa Lyrics basant panchmi 2026: सरस्वती चालीसा हिंदी में लाभ सहित यहां पढ़ें। (छविः एआई)

Saraswati Chalisa in Hindi: सरस्वती चालीसा विद्या की देवी मां सरस्वती की सबसे शक्तिशाली स्तुति मानी जाती है। इसमें बताया गया है कि मां की कृपा से वाल्मीकि, कालिदास और तुलसीदास जैसे महाकवि हुए। सरस्वती चालीसा मां शारदा के विभिन्न रूपों (दुर्गा, शताक्षी) और उनके द्वारा राक्षसों के वध का वर्णन करती है। इसका नियमित पाठ बुद्धि, बल, आत्मविश्वास और ज्ञान बढ़ाता है। भय दूर करता है और जीवन के हर संकट (आर्थिक, मानसिक और शारीरिक) से मुक्ति दिलाता है।

सरस्वती चालीसा के लाभ | Saraswati Chalisa Benefits

  1. बुद्धि और विवेक की प्राप्ति: चालीसा के अनुसार, मां सरस्वती 'सकल बुद्धि बलरासी' हैं। इसके पाठ से जड़ बुद्धि व्यक्ति भी चतुर और विवेकशील बन जाता है।
  2. कला और साहित्य में सफलता: चालीसा में उल्लेख है, वाल्मीकि और कालिदास जैसे कवि मां शारदा की कृपा से ही विख्यात हुए। यह कलाकारों और लेखकों के लिए वरदान से कम नहीं है।
  3. परीक्षा और शिक्षा में विजय: विद्यार्थियों के लिए, इसका पाठ एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ाने में मदद करता है।
  4. पाप बुद्धि का नाश: पाठ मन से गलत विचारों को दूर कर, सुविचारों का संचार करता है और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
  5. संकटों से रक्षा: चाहे जंगल में हिंसक पशुओं का भय हो, समुद्र में तूफान हो या भूत-प्रेत की बाधा, मां का नाम जपने से हर संकट टल जाता है।
  6. संतान सुख की प्राप्ति: चालीसा कहती है, जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, उसे गुणवान संतान की प्राप्ति होती है।
  7. दरिद्रता और भय से मुक्ति: यह चालीसा गरीबी को दूर कर, जीवन में मंगल और सुख-समृद्धि लाती है।

दोहा

जनक जननि पद्मरज, निज मस्तक पर धरि।
बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥
पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु।
दुष्टजनों के पाप को, मातु तु ही अब हन्तु॥

जय श्री सकल बुद्धि बलरासी।
जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥

जय जय जय वीणाकर धारी।
करती सदा सुहंस सवारी॥

रूप चतुर्भुज धारी माता।
सकल विश्व अन्दर विख्याता॥

जग में पाप बुद्धि जब होती।
तब ही धर्म की फीकी ज्योति॥

तब ही मातु का निज अवतारी।
पाप हीन करती महतारी॥

वाल्मीकिजी थे हत्यारा।
तव प्रसाद जानै संसारा॥

रामचरित जो रचे बनाई।
आदि कवि की पदवी पाई॥

कालिदास जो भये विख्याता।
तेरी कृपा दृष्टि से माता॥

तुलसी सूर आदि विद्वाना।
भये और जो ज्ञानी नाना॥

तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा।
केवल कृपा आपकी अम्बा॥

करहु कृपा सोइ मातु भवानी।
दुखित दीन निज दासहि जानी॥

पुत्र करहिं अपराध बहूता।
तेहि न धरई चित माता॥

राखु लाज जननि अब मेरी।
विनय करउं भांति बहु तेरी॥

मैं अनाथ तेरी अवलंबा।
कृपा करउ जय जय जगदंबा॥

मधु-कैटभ जो अति बलवाना।
बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना॥

समर हजार पांच में घोरा।
फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा॥

मातु सहाय कीन्ह तेहि काला।
बुद्धि विपरीत भई खलहाला॥

तेहि ते मृत्यु भई खल केरी।
पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥

चंड मुण्ड जो थे विख्याता।
क्षण महु संहारे उन माता॥

रक्त बीज से समरथ पापी।
सुरमुनि हृदय धरा सब काँपी॥

काटेउ सिर जिमि कदली खम्बा।
बार-बार बिन वउं जगदंबा॥

जगप्रसिद्ध जो शुंभ-निशुंभा।
क्षण में बांधे ताहि तू अम्बा॥

भरत-मातु बुद्धि फेरेऊ जाई।
रामचन्द्र बनवास कराई॥

एहिविधि रावण वध तू कीन्हा।
सुर नरमुनि सबको सुख दीन्हा॥

को समरथ तव यश गुन गाना।
निगम अनादि अनंत बखाना॥

विष्णु रुद्र जस कहिन मारी।
जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥

रक्त दन्तिका और शताक्षी।
नाम अपार है दानव भक्षी॥

दुर्गम काज धरा पर कीन्हा।
दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥

दुर्ग आदि हरनी तू माता।
कृपा करहु जब जब सुखदाता॥

नृप कोपित को मारन चाहे।
कानन में घेरे मृग नाहे॥

सागर मध्य पोत के भंजे।
अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥

भूत प्रेत बाधा या दुःख में।
हो दरिद्र अथवा संकट में॥

नाम जपे मंगल सब होई।
संशय इसमें करई न कोई॥

पुत्रहीन जो आतुर भाई।
सबै छांड़ि पूजें एहि भाई॥

करै पाठ नित यह चालीसा।
होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा॥

धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै।
संकट रहित अवश्य हो जावै॥

भक्ति मातु की करैं हमेशा।
निकट न आवै ताहि कलेशा॥

बंदी पाठ करें सत बारा।
बंदी पाश दूर हो सारा॥

रामसागर बांधि हेतु भवानी।
कीजै कृपा दास निज जानी॥

दोहा

मातु सूर्य कान्ति तव, अन्धकार मम रूप।
डूबन से रक्षा करहु परूं न मैं भव कूप॥
बलबुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु।

Frequently Asked Questions

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