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Holika Dahan Ki Katha: , क्या होलिका सच में सिर्फ खलनायिका थी या एक अधूरी प्रेम कहानी की शिकार?

Holika Dahan Story: फाल्गुन पूर्णिमा की रात केवल रंगों और उल्लास की प्रतीक नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी कथा भी समेटे हुए है जिसमें सत्ता, अहंकार, भक्ति और त्याग के भाव एक साथ दिखाई देते हैं।

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भारत

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MEGHA ROY

Feb 23, 2026

Why Holika Burned in Fire, Prahlad Bhakti Story,

Holika Dahan Significance|फोटो सोर्स- Freepik

Holika Dahan Ki Katha, Holika Dahan Story: 2 मार्च को होलिका दहन का पर्व मनाया जाएगा। हर साल की तरह इस बार भी बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक यह उत्सव धूमधाम से मनाया जाएगा। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस होलिका को हम खलनायिका के रूप में जानते हैं, उसकी कहानी का एक भावनात्मक और अनकहा पहलू भी हो सकता है?पौराणिक कथाओं में होलिका को हिरण्यकश्यप की बहन बताया गया है, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था। प्रह्लाद की अटूट भक्ति के सामने उसका अहंकार तो पराजित हुआ, लेकिन कुछ लोककथाएं यह भी संकेत देती हैं कि वह परिस्थितियों और भाई के आदेश के बीच उलझी एक स्त्री थी।आखिर होलिका दहन की इस कथा में प्रेम, कर्तव्य और अहंकार का कौन सा सच छिपा है? आइए जानते हैं होलिका दहन से जुड़ी वह खास कहानी, जिसके बारे में शायद बहुत कम लोग जानते हैं।

Prahlad aur Holika Ki Katha: राजा हिरण्यकश्यप की कठोर योजना - कथा

असुरराज हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद की भगवान विष्णु के प्रति अटूट भक्ति से अत्यंत क्रोधित था। उसने अनेक उपायों से प्रह्लाद को समझाने और डराने की कोशिश की, किंतु हर प्रयास विफल रहा। कथा के अनुसार, हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को योजना में सम्मिलित किया। होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था। योजना यह थी कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि कुंड में बैठे, जिससे बालक भस्म हो जाए। परंतु कहा जाता है कि होलिका इस योजना से सहमत नहीं थी। वह अपने जीवन के नए अध्याय की तैयारी में थी उसका विवाह निश्चित हुआ था। भाई के दबाव और कठोर शब्दों ने उसे ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया, जहां कर्तव्य और भय के बीच उसे एक कठिन निर्णय लेना पड़ा।

अग्नि की लपटों में सत्य की विजय

पूर्णिमा की रात अग्नि प्रज्वलित हुई। होलिका प्रह्लाद को लेकर हवन कुंड में बैठी, किंतु घटनाक्रम अप्रत्याशित रहा। तेज हवा के झोंके ने अग्नि से रक्षा करने वाला वस्त्र प्रह्लाद को ढक लिया। अग्नि की लपटों ने होलिका को घेर लिया और वह भस्म हो गई, जबकि प्रह्लाद सुरक्षित बाहर आ गया। यह दृश्य केवल एक चमत्कार नहीं, बल्कि यह संदेश था कि सच्ची आस्था और निष्कपट भक्ति को कोई शक्ति नष्ट नहीं कर सकती।

होलाष्टक में किन कार्यों से बचें?

होलिका दहन से पहले के आठ दिन “होलाष्टक” कहलाते हैं। मान्यता है कि इस अवधि में विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, भूमि पूजन या नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे मांगलिक कार्यों से बचना चाहिए। विशेषकर उत्तर भारत में लोग इन नियमों का पालन श्रद्धा से करते हैं। हालांकि शास्त्र यह भी कहते हैं कि यदि कार्य अत्यावश्यक हो और उचित मुहूर्त में, सच्चे भाव से किया जाए, तो उसका फल प्रतिकूल नहीं होता।