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एक छोटी व शांत पहाड़ी पर एक बैरागी रहते थे। उनकी आत्मा शुद्ध और हृदय निर्मल था। उस हरे-भरे एकांत में वे अकेले प्रभुभक्ति में रमे रहते। वे न कहीं आते-जाते और न ही उनकी विशेष आवश्यकताएं थीं। अपनी सीमित जरूरतों को वे वहीं पूर्ण कर लेते थे। वन के पशु और आकाश के पक्षी सभी उनके पास आते और वे उनसे खूब बातें करते।
जो कुछ ज्ञान उनके पास था, वे उसमें से चुन-चुनकर सारपूर्ण बातें उन्हें बताते। पशु-पक्षियों को भी उनकी बातों में खूब रस आता। वे उन्हें घेरकर बैठ जाते और रात तक हिलने का नाम नहीं लेते, तब वे स्वयं ही उन्हें जाने की आज्ञा देकर अपने मंगल आशीषों के साथ वायु और जंगल के भरोसे सौंप देते।
एक दिन जब वे प्रेम के संबंध में उपदेश दे रहे थे तो एक तेंदुए ने पूछा- आप हमसे प्रेम की चर्चा कर रहे हैं तो यह बताइए कि आपकी प्रेयसी कहां है? बैरागी ने उत्तर दिया- मेरी कोई प्रेयसी नहीं है। यह सुनकर सभी पशु-पक्षी आश्चर्यचकित होकर बोले- भला वह हमें प्रेम के बारे में क्या सिखा सकता है, जो स्वयं इस विषय में कोरा है।
तब बैरागी मुस्कराकर बोले- प्रेम को प्रेमी-प्रेयसी के संकुचित दायरे में मत बांधो। प्रेम उदात्त भाव है और व्यापक अर्थों को अपनी विशाल परिधि में समेटे है। उसे सृष्टि के कण-कण में महसूस करो, तभी तुम प्रेम के दिव्य आनंद को प्राप्त करोगे। वस्तुत: प्रेम की विशालता और गहनता अनिर्वचनीय है, जिसे शब्द बांध नहीं सकते और रिश्तों की संकुचितता से वह परे है। वास्तव में प्रेम वृहद अनुभूति का विषय है और अलौकिक आनंद का माध्यम है।

Published on:
31 Dec 2015 08:01 am
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