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कृष्ण को पूर्णावतार माना है और गीता को शाश्वत ग्रन्थ। अर्थात् गीता में सृष्टि का सम्पूर्ण विज्ञान निहित है। हमारा सांसारिक दर्शन मात्र नहीं है।

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Gulab Kothari

Jan 07, 2018

sadhu, meditation

sadhu in sunrise

कृष्ण कहते हैं- ‘जो ज्ञान मैंने विवस्वान को दिया, मनु को दिया, वही ज्ञान अर्जुन! मैं तुमको दे रहा हूं।’ क्या विवस्वान और मनु भी महाभारत जैसे युद्ध में रत थे? क्या मेल है अर्जुन का विवस्वान से? अर्जुन को दिया गया ज्ञान विवस्वान-सूर्य के किस काम का? क्या सूर्य ? के लिए भी यही ज्ञान व्यावहारिक है? क्या अर्जुन भी इस बात को समझ पाया कि सूर्य के लिए यह ज्ञान कैसे उपयोगी होगा? अर्जुन पृथ्वीलोक तथा क्षर सृष्टि का प्राणी है, सूर्य अक्षर सृष्टि का अधिष्ठाता है। सूर्य जगत् का कारण रूप पिता है। अक्षर सृष्टि अदृश्य प्राणों की सृष्टि है। कृष्ण क्या बिना विचार किए बोल सकते हैं! तब तो सम्पूर्ण गीता के अर्थ बदल जाएंगे।

समान कार्य
कृष्ण ने सही कहा। सम्पूर्ण सृष्टि-संचालन के सिद्धान्त, नियम, तत्त्व एक समान कार्य करते हैं। हां, सातों लोकों में इनका स्वरूप भिन्न-भिन्न हो सकता है। ईश्वर और जीव तात्विक रूप से समान हैं। जीव भी ईश्वर का ही अंश है। पुत्र पिता से भिन्न कैसे हो सकता है? ईश्वर का आत्मा भी मन-प्राण-वाङ्मय है और जीव का आत्मा भी मन-प्राण-वाङ्मय है। दोनों ही षोडशी पुरुष भी हैं। एक सृष्टि के आदि काल से प्रकाशित है, अर्जुन उसके सामने अत्यन्त अल्पायु है। जैसे हाथी के आगे चींटी!

कृष्ण को पूर्णावतार माना है और गीता को शाश्वत ग्रन्थ। अर्थात् गीता में सृष्टि का सम्पूर्ण विज्ञान निहित है। हमारा सांसारिक दर्शन मात्र नहीं है। गीता उस मूल सिद्धान्त की बात कर रही है-‘यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे’। मृत्युलोक और अमृत लोक दोनों पर गीता के वचन समान रूप से लागू होते हैं। सूर्य और मनु अमृत लोक के तत्त्व हैं तथा अर्जुन मृत्यु लोक का प्राणी है। सब का आधार अव्यय पुरुष है। कृष्ण स्वयं को ही अव्यय पुरुष कह रहे हैं। अव्यय पुरुष की ही मनु संज्ञा है। काल पुरुष भी इसी का नाम है। यही कालाग्नि रूप है।

परमेष्ठी लोक आप: (भृगु-अंगिरा) लोक है। ये ही सोम और अग्रि हैं। आप: तत्त्व (अथर्वा) की आहुति जब मातरिश्वा वायु द्वारा कालाग्रि में दी जाती है, तब विश्व का निर्माण शुरू होता है। भौतिक सृष्टि मरणधर्मा है। ‘क्षर: सर्वाणि भूतानि’। क्षर का अधिष्ठाता अक्षर नियत तत्त्व है। इस अव्ययानुगृहीत अक्षर तत्त्व का विकास सूर्य में होता है। यही अव्यय मन (मनु) सर्वज्ञ बनकर ज्ञानमय तप से विश्व का निर्माण करता है। इसी को शाश्वत ब्रह्म (परात्पर) कहते हैं। स्वयं अव्यय भी माया अवच्छेद के कारण अव्यय भी शाश्वत नहीं रहता। रस-बल की समष्टि-परात्पर-ही शाश्वत ब्रह्म है। क्षर को ब्रह्म तथा अक्षर को अमृत कहते हैं। ईश्वर संस्था के इन पांचों महिमा विवर्त से जीव संस्था के पांचों विवर्त बनते हैं।

वसु, रुद्र और आदित्य अग्नि ही वैश्वानर अग्रि बनता है। अग्रि में वायु (रुद्र) और आदित्य की आहुति से वैश्वानर अग्रि-विराट्- बनता है। जब अग्रि (वसु) और आदित्य वायु में आहूत होते हंै, तब हिरण्यगर्भ का निर्माण होता है। जब आदित्य में अग्रि और वायु आहूत होते हैं, तब सर्वज्ञ बनता है। इन्हीं को वाक्, प्राण और मन से भी कहा जाता है।

रूपान्तरण
पृथ्वी पर वर्षा से इन तीनों अग्रियों का रूपान्तरण होता है। विराट्, हिरण्यगर्भ तथा सर्वज्ञ से क्रमश: वैश्वानर, तेजस और प्राज्ञ बन जाते हैं। विराट, हिरण्यगर्भ, सर्वज्ञ हमारी पितृ संस्था है, ईश्वर कहलाती है। वहीं वैश्वानर, तेजस, प्राज्ञ जीव संस्था कहलाती है। हमारी आत्मा का अर्धभाग ईश्वर (साक्षी) रूप तथा आधा भाग जीवन कर्ता रूप प्रतिष्ठित रहता है।

माया ब्रह्म से जुड़ती नहीं है। माया के षड्गुणों-माया, कला, गुण, विकार, आवरण और अंजन-से मुक्त तत्त्व ही परात्पर कहलाता है। इसका तो मानस चित्र भी संभव नहीं है। जब परमेश्वर पर माया बल आवरित होते हैं, तब केन्द्र का माया ही पुरुष कहलाता है। ‘पुरि शेते’-पुरुष। अव्यय पुरुष कहलाता है। मनु तत्त्व का विकास सूर्य में होता है, अत: मनु को अग्रि भी कहा जाता है। सूर्य से प्रकाशित द्युलोक इन्द्रप्राणमय है, अत: मनु इन्द्र भी है। यही १४ भुवनों के भूतसर्गों का अधिष्ठाता (प्रभव, प्रतिष्ठा, परायण) है। इसीलिए मनु की प्रजापति संज्ञा भी है। यह मनु प्राणाग्रि स्वरूप होने से प्राण भी कहलाता है।

स्वयंभू और परमेष्ठी में षोडशी प्रजापति के अव्यय भाग की प्रधानता रहती है। चन्द्रमा एवं पृथ्वी में क्षर भाग प्रधान रहता है। इन्द्र प्राणमय (अमृत-मृत्युमय) सूर्य में अक्षर का विकास होता है। चूंकि अक्षर में अव्यय और क्षर भी जुड़े रहते हैं, अत: इसे ब्रह्म (क्षर) तथा पर (अव्यय) भी कहते हैं। इसलिए इन्द्र प्राण में षेाडशकल प्रजापति की सत्तासिद्ध हो जाती है। इसी इन्द्रप्राणमय सौर तत्त्व का नाम ‘मनु’ है। स्वप्र में इन्द्रिय व्यापार ठहर जाता है, केवल मन का संसार ही व्यक्त होता है। यही मन मनु है। अव्यय का विकास है। कालाग्रि स्वरूप मनु ही संवत्सर, अयन, पक्ष, अहोरात्र, मुहूर्त , घटिका होरा बनता है। पुराणों में मनु को मुहूर्त कहते हैं। मनु ही मन्वन्तर है। गीता में कृष्ण कहते हैं-

‘अव्यक्ताद् व्यक्रय: सर्वा: प्रभवन्त्यहरागमे।
रात्र्या गमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यकृसंज्ञके।।’

अर्थात्-अव्यक्त नाम से प्रसिद्ध अक्षर ही दिन रूप में व्यक्त होकर सृष्टि रचता है एवं रात्रिक्रम में वही मनु स्वरूप अक्षर पुन: अव्यक्त होकर प्रलय बन जाता है।