
gulab kothari article, rajasthan patrika article, religion and spirituality, dharma karma, gulab kothari, gurukul
मां से ज्यादा संस्कार देने वाला इस धरती पर आज भी कोई नहीं है। पर आज बच्चों को मां का प्यार नहीं मिलता। बड़े घरों में देखो तो बच्चा जब चौथी-पांचवीं में आता है उससे पहले ही मां-बाप उसे हॉस्टल में भेज देते हैं। उसमें संस्कार कहां से आएंगे। उस बच्चे के मां-बाप जिन्दा हैं पर वह तकलीफ में पड़ गया। उसके आस-पास अपना कोई नहीं है। इससे ज्यादा दुर्दशा जीवन की क्या होगी? इसको हम सुख मानते हैं। घर में मां का मन नहीं लगता। वह सोचती है कि पता नहीं बेटे ने खाना खाया कि नहीं, सोया कि नहीं। फिर कोई मिल गया तो कहेंगे कि बेटा तो आजकल लंदन में पढ़ता है।
अन्दर रो रहे हैं और बाहर एक मुखौटा लगाकर अहंकार की तुष्टि कर रहे हैं। ऐसा करके हम बच्चे को सजा देते हैं या अपने आप को। फिर वही बच्चा बड़ा होकर अच्छी पढ़ाई करके आपके पास आएगा? हम अपने ज्ञान को, अपनी सुविधा को ईश्वर ने जो कुछ दिया सबको मिलाकर उनका उपयोग हम कहां कर रहे हैं। इसको भी हमें समझना पड़ेगा। बेटे के प्रति भी संवेदना नहीं है तो समाज के प्रति हमारी कलम में संवेदना कहां से आएगी।
मन का विकास
सम्प्रेषण की पहली शर्त है कि मैं अपने लिए, अपने हित के लिए नहीं सर्वजन हिताय, समाज के भले के लिए कुछ लिखूं। गीता भी यही कहती है। पर वे भाव मन में कैसे पैदा होंगे इसे समझना होगा। अब ऐसे भाव शिक्षा से नहीं आते क्योंकि शिक्षा से शरीर और बुद्धि दो ही चीजों का विकास हो रहा है। मन का विकास केवल मां कर सकती है। बच्चा पेट में हो तब भी कर सकती है। लेकिन वह प्रक्रिया भी जीरो पर आ गई। अब किसी घर में अभिमन्यु पैदा नहीं होते क्योंकि मां को शायद इस बात का ज्ञान ही नहीं है कि वह अपने बच्चे को कुछ भी बना सकती है। इस धरती पर बच्चे को संस्कार देने वाला पहला गुरु मां ही होती है। अब यह बात गौण हो गई है।
स्कूलों के अन्दर गुरु नहीं रहा। टीचर आ गया। टीचर तो खाली सब्जेक्ट पढ़ाने के लिए आता है। जिन्दगी से कोई मतलब नहीं है उसको। अब मन और आत्मा शिक्षा से बाहर निकल गए तो वह अधूरा व्यक्ति बन रहा है। अधूरा व्यक्ति जैसे-जैसे पढ़ाई आगे करता चला जाएगा उसका अधूरापन बढ़ता चला जाएगा। बच्चा समय के साथ मन से अपंग हो रहा है। यह शिक्षा हमें कुछ दे रही है या छीन रही है इसका आकलन भी लेखकों को करना पड़ेगा। अपंग व्यक्ति से समाज कैसे विकसित और समृद्ध होगा। यह भी एक सवाल है।
बच्चे के बड़ा होने का स्तर क्या है, इस पर भी लेखन होना चाहिए। क्योंकि अपने घर जो बच्चा पढ़ाई करके लौटकर आ रहा है उसमें क्या-क्या बदलाव आए। वह जो सीख रहा है उसको हम ही नियमित रूप से देख पाते हैं। उसकी संवेदनाओं का पालन-पोषण करते हैं। स्कूल वाले तो सोचते हंै कि इसको अच्छी नौकरी मिल जानी चाहिए। इसके बाद उनका कोई लेना-देना नहीं है। हम भी उसी लाइन में पड़ गए कि बच्चों के अच्छे नम्बर आ जाएं और अच्छी नौकरी लग जाए। इसके बाद हमारी बच्चों के विकास में किसी तरह की भूमिका नहीं रहती।
मन से संप्रेषण
अगर अच्छा लेखन करना है, अच्छा सम्प्रेषण करना है तो मन से सम्प्रेषण करना पड़ेगा। क्योंकि शरीर और बुद्धि से किया हुआ सम्प्रेषण किसी के भी मन को नहीं छू सकता। पहली शर्त है यह। अगर कही गई बात में मिठास व मन नहीं है तो वह किसी के मन तक नहीं पहुंचेगी। मन तक यदि नहीं पहुंची, तो हमारा कहा हुआ सब बेकार है। उसके बिना, इस ब्रह्मास्त्र के बिना व्यक्ति आपकी बात को ग्रहण नहीं करता। आपने किताब भी लिख दी, उसने पढ़ भी ली। पर जरूरी नहीं कि पन्द्रह दिन बाद उसको याद भी रहे। पर कोई लाइन मन को छू गई तो उम्र भर याद रहेगी। बस इतना ही अन्तर है। सम्प्रेषण की भूमिका में शरीर का सम्प्रेषण शरीर तक रुक जाता है, बुद्धि का सम्प्रेषण बुद्धि तक रुक जाता है, मन का सम्प्रेषण मन तक जाता है।
बिना मन के संप्रेषण के किसी से जुड़ ही नहीं सकते। बच्चा जिसके मुंह में जुबान नहीं है। मां-बाप शब्द भी बोलना नहीं आता उसकी हर चीज को मां समझती है। यह सम्पे्रषण है। सम्प्रेषण की इस कला को ही हम माया कहते हैं। इसी प्रकार की दक्षता और विशेषज्ञता को लेखन में काम में लेना चाहिए। तभी समाज में सुधार होगा। तभी लोगों के जेहन में हमारा लिखा हुआ शब्द अटकेगा, याद रहेगा वरना शब्द की ताकत क्या है। भाव जब तक उसमें नहीं जुड़ेंगे तब तक शब्द कभी प्रभावित नहीं होंगे। मन को जोडऩा पड़ेगा। सम्प्रेषण संवेदनशीलता को शब्द देना है।

Published on:
02 Jul 2018 03:24 pm
बड़ी खबरें
View Allधर्म और अध्यात्म
धर्म/ज्योतिष
ट्रेंडिंग
