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स्पंदन: विच्छेद-1

शिक्षा और संचार माध्यमों ने जीवन की दिशा को बांधना शुरू कर दिया। यहां तक कि विज्ञान भी व्यक्ति को आत्मा से दूर खींचता ही जा रहा है।

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Gulab Kothari

Jan 28, 2018

near death experience

near death experience girl

वैसे तो यह शब्द बुद्धि के परिवार का है। बुद्धि अपनी उष्णता के कारण सम्बन्धों को तोडऩे में तत्पर दिखाई पड़ती है। आज यह शब्द वैवाहिक सम्बन्धों की इतिश्री के लिए खूब काम आ रहा है। तलाक यानी कि विवाह-विच्छेद। क्या वैवाहिक सम्बन्ध इस शब्द के आगे बौने हो जाते हैं अथवा वहां बढ़ते हुए अहंकार का प्रतिनिधित्व यह शब्द करता है? जो भी हो आज तो इस शब्द का बाजार गर्म है। भारत ही क्यों सम्पूर्ण विश्व की सभ्यता इसी की छत्र-छाया में विकसित होती जान पड़ती है। यहां भारतीय दर्शन में तो विवाह आत्मा के धरातल से जुड़ा था। नई जीवन शैली ने आत्मा को जीवन से ही अलग कर दिया। जीवन से आत्मा का विच्छेद ही विवाह विच्छेद के मूल में है। नई संस्कृति में विच्छेद भी विवाह की तरह अनिवार्य होता जा रहा है।

मैं और मेरा शरीर
समय के साथ परिवर्तन भी अनिवार्य है। व्यक्ति भी उसके अनुरूप बदलता जाता है। जब परिवर्तन की गति बहुत तेज हो, व्यक्ति पीछे रह जाए तो समाज में भी विघटन होता है। शिक्षा और संचार माध्यमों ने जीवन की दिशा को बांधना शुरू कर दिया। यहां तक कि विज्ञान भी व्यक्ति को आत्मा से दूर खींचता ही जा रहा है। उसका भावनात्मक जीवन और आत्मीयता का भाव सिकुड़ते चले जा रहे हैं। मैं और मेरा शरीर, बस! इसके आगे मेरी कोई पहचान ही नहीं रह जाती। यही मेरे ‘अहं’ और अस्तित्व के होने का पहला और अन्तिम बिन्दु रह गया है।

क्या भारत में पुरुषार्थ, आश्रम व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था का आधार मात्र शरीर ही रहा है? क्या कृष्ण की गीता का ज्ञान अर्जुन के लिए मात्र शरीर परक ही था? क्या शरीर आधारित समाज में आध्यात्मिक मूल्यों के लिए कोई स्थान होगा? क्या हमारे शिक्षित जीवन का अर्थ केवल शरीर का पोषण है। ‘मैं और मेरा परिवार’ बस!

तब मानव के चारों और इतने ग्रन्थों का अम्बार क्यों लगा है-वेद-उपनिषद्-गीता से लेकर दर्शन और सम्प्रदायों का झमेला क्यों है? क्योंकि शरीर तो पशु संस्था का अंग है। मनुष्य कुछ भिन्न प्राणी है। यह अलग बात है कि वह अपने अहंकार के कारण पूर्ण स्वच्छन्द होकर पशुवत् ही जीना चाहता है। पशु एक अनियंत्रित संस्था है। प्रवाह पतित हो जाना उसका स्वभाव है। इसी प्रवाह में वह सारे अनर्थ कर बैठता है। आज का शिक्षित-अतिशिक्षित मानव भी अपने अहंकार के प्रवाह में अपने ही पांवों पर कुल्हाड़ी चला रहा है। ज्ञान के जंगल में अपनी पहचान ढूंढने को आतुर है। जबकि ज्ञान ही उसे ‘स्व’ से इतनी दूर ले जाता है कि वह ‘स्व’ को भूल ही बैठता है। फिर शरीर ही हावी हो जाता है। सुविधाओं में खो जाता है। शान्ति की खोज में निकला राही वासनाओं के पीछे लग जाता है। अपने ही बुने हुए जाल में मकड़ी की तरह फंस जाता है।

स्वार्थ के लिए
व्यक्ति सुख की प्राप्ति के लिए ही विवाह करता है। परिवार का निर्माण करता है। दो विपरीत धाराओं का योग होता है। पुरुष और स्त्री, अग्नि और सोम , अद्र्ध-नारीश्वर। पुरुष को शान्ति चाहिए और स्त्री को सुख। आज की शिक्षा भी सुखों की ओर ही ले जाती है। जब व्यक्ति सुख और पहचान के लिए जीने लगेगा, तब स्वार्थ अपने चरम पर होगा। ‘कोई अन्य’ उस व्यक्ति की दृष्टि में गौण हो जाएगा। अपनी पहचान के लिए समझौता कर पाना सहज नहीं होता। हां, सुख के लिए तो फिर भी कहीं-कहीं किया जा सकता है।

धरती हमारी माता है। हमें पैदा करती है, पालती-पोसती है, आश्रय देती है। हमने उसका अपमान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उसके सीने को छेद-छेद कर दिया, दोहन क्या-क्या नहीं किया, पवित्रता को कहां-कहां नष्ट नहीं किया। केवल अपने स्वार्थ का ही ध्यान रखा। आज जब मां का आक्रोश फूटने लगा, समुद्री तूफान, ज्वालामुखी, भूकम्प आदि का एक तेज सिलसिला हृदय विदारक साबित होने लगा, ग्लोबल वार्मिंग के संकेत उठने लगे, तो हम सहन कर ही रहे हैं। व्यक्ति अपने कर्मों का फल ही भोगता है। क्या हम धरती को छोडक़र रसातल में जाने को तैयार हैं?