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फेसबुक और एप्पल के प्रमुखों को भारत के इस आश्रम में क्या मिला, जिसने बदल दी इनकी जिंदगी

भारत आध्यात्मिक शक्ति और चमत्कारी संतों के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। जब दुनिया में कहीं समाधान नहीं दिखता तब दुनिया भारत की ओर देखती है। इसका जीता जागता प्रमाण दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों के कर्ताधर्ताओं ने महसूस किया और लोगों को बताया। फेसबुक और एप्पल जैसी कंपनी के कर्ताधर्ताओं को यह एहसास हुआ उत्तराखंड के कैंचीधाम में बाबा नीम करोरी से तो आइये जानते हैं स्टीव जॉब्स (Steve Jobs), मार्क जुकरबर्ग (mark zuckerberg) जैसे दिग्गज कैसे हुए नीम करोली बाबा (neem karoli baba) के मुरीद...

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Pravin Pandey

Sep 09, 2023

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नीम करोली बाबा के चमत्कार

फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग वर्ष 2015 में पीएम नरेंद्र मोदी से मिले थे। उनसे बात करते हुए जुकरबर्ग ने जिक्र किया था कि फेसबुक के मुश्किल समय में अपने मेंटॉर एप्पल के सीईओ स्टीव जॉब्स के कहने पर उन्होंने भारत में एक मंदिर का भ्रमण किया था। जुकरबर्ग ने कहा कि, उन्होंने कहा था कि कंपनी के मिशन के साथ फिर से जुड़ने के लिए मुझे भारत के उस मंदिर का दौरा करना चाहिए जहां वह जा चुके हैं।


यहां उन्हें एहसास हुआ कि कैसे लोगों को कनेक्ट किया जा सकता है। बता दें कि 1974 में एप्पल के सीईओ स्टीव जॉब्स ने आध्यात्मिक शक्ति की खोज में भारत का दौरा किया था और नीम करोली बाबा के आश्रम कैंची धाम आए थे। हालांकि उनकी मुलाकात बाबा से नहीं हो पाई, लेकिन वह आश्रम में रूके थे...

स्टीव जॉब्स भी गए थे कैंची धाम आश्रम
कहा जाता है कि 1974 में स्‍टीव जॉब्‍स बाबा अपने जीवन का सच जानने भारत आए थे। उन्हें यहां आने की प्रेरणा अपने दोस्त रॉबर्ट फ्रीडलैंड से मिली थी, जो 1973 में भारत आए और बाबा नीम करोरी के साथ रहे थे। बाद में जब स्टीव जॉब्स 1974 में नीम करोली बाबा आश्रम पहुंचे, लेकिन इससे पहले 1973 में ही बाबा देह त्याग चुके थे। लेकिन स्टीव जॉब्‍स नैनीताल के कैंचीधाम में रूके और कुछ समय यहां गुजारने के बाद अमेरिका लौट गए और एप्पल कंपनी बनाई। फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।

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क्या कहा था स्टीव जॉब्स ने
एक बार जॉब्स ने बताया था कि मैं भारत यह जानने के लिए आया था कि मैं कौन हूं ? मैं अपने माता-पिता के बारे में जानना चाहता था, क्योंकि मेरे पालक माता पिता पॉल जॉब्‍स और क्‍लारा ने मुझे अनाथालय से गोद लिया था। 1974 में स्टीव भारत आए और हरिद्वार कुंभ मेले में समय बिताया, वहां से नैनीताल चले गए। यहां वे जहां ठहरे, वहां उन्‍हें स्‍वामी योगानंद परमहंस की आत्‍मकथा ऑटोबायोग्रफी ऑफ ए योगी मिली। स्टीव ने इसे पढ़ डाला। कहा जाता है कि स्‍टीव साल में एक बार इस किताब को जरूर पढ़ते थे।


ऐसे शुरू किया ध्यान
यह भी कहा जाता है कि भारत में रहने के दौरान स्‍टीव गांव-गांव पैदल घूमने लगे और नीम करोली बाबा की कथाएं सुनने के साथ ध्‍यान भी करने लगे। सात महीनों तक भारत में घूमने के बाद वह अमेरिका पहुंचे तो उनकी हालत देखकर उनकी मां भी उनको पहचान नहीं सकी थीं। स्‍टीव जॉब्‍स की अंतर्यात्रा आगे भी चलती रही, वह जैन बौद्ध, हिंदुत्‍व में आत्‍मसाक्षात्‍कार की तलाश करते रहे, लेकिन अंदर बाबा नीम करोली का स्थान रहा। उनके अंतिम समय में उनके दोस्‍त लैरी, जो खुद भी बाबा के भक्त थे, उनके साथ थे।
लैरी कहते हैं,'उसने मुझे बुलाकर पूछा, क्‍या तुम अभी भी भगवान में भरोसा करते हो? लैरी ने कहा, हां। फिर दोनों कुछ देर ईश्‍वर और उस तक पहुंचने के रास्‍तों पर बात करते रहे। अचानक लैरी ने जॉब्‍स से पूछा, कुछ गड़बड़ हो गई क्‍या? जॉब्‍स ने धीरे से कहा, मुझे कैंसर है। स्‍टीव जॉब्‍स की मौत 5 अक्‍टूबर 2011 को अग्‍नाशय या पैंक्रियाज के कैंसर से हो गई।
कहा जाता है कि 5 अक्‍टूबर 2011 को स्‍टीव जॉब्‍स की कैंसर से मौत हो गई और यह भी कहा जाता है कि उनकी मौत के बाद उनके तकिए के नीचे से बाबा नीम करोली का छोटा सा फोटो मिला था।