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गणेश जी ने अपना वाहन मूषक ही क्यों चुना? जानिए 2 रोचक कथा

गणेश जी ने कदाचित चूहे के इन्हीं गुणों को देखते हुए उसे अपना वाहन चुना होगा

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Priya Singh

Feb 07, 2018

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नई दिल्ली। जैसा की हम जानते हैं गणेश शिवजी और पार्वती के पुत्र हैं। उनका वाहन डिंक नामक मूषक है। गणों के स्वामी होने के कारण उनका एक नाम गणपति भी है। क्या कभी आपके मन में ये सवाल आया कि भगवान गणेश की शारीरिक बनावट के हिसाब से उनका वाहन छोटा सा चूहा क्यों है? गणेश जी ने आखिर छोटे से जीव को ही अपना वाहन क्यों चुना?

गणपति बुद्धि और विद्या के देवता हैं। तर्क-वितर्क में उनका कोई सानी नहीं है। एक-एक बात या समस्या की तह में जाना, और उसके निष्कर्ष तक पहुंचना उनका शौक है और इसी तरह चूहा भी तर्क-वितर्क में पीछे नहीं रहता। हर चीज को काट-छांट कर रख देता है और उतना ही फुर्तीला भी है और साथ ही साथ जागरूक रहने का संदेश भी देता है।

गणेश जी ने कदाचित चूहे के इन्हीं गुणों को देखते हुए उसे अपना वाहन चुना होगा लेकिन इस बात को लेकर कई प्राचीन कथाएं प्रचलित हैं।

पहली कथा-

एक कथा ये भी प्रचलित है कि राजा इन्द्र के दरबार में क्रौंच नामक गंधर्व था। एक बार इंद्र किसी गंभीर विषय पर चर्चा कर रहे थे लेकिन क्रौंच किसी और ही सोच में डूबा हुआ था। वह अप्सराओं से हंसी ठिठोली करने व्यस्थ था। इंद्र का ध्यान उस पर गया तो नाराज इंद्र ने उसे चूहा बन जाने का श्राप दे दिया। क्रौंच का चंचल स्वभाव तो बदलने से रहा। एक बलवान मूषक के रूप में वह सीधे ने पराशर ऋषि के आश्रम में जा गिरा वहां जाते ही उसने भयंकर उत्पात मचा दिया, आश्रम के सारे मिट्टी के पात्र तोड़कर सारा अन्न खा गया, वाटिका भी उजाड़ डाली, ऋषियों के सारे वल्कल वस्त्र और ग्रंथ कुतर डाले। पराशर ऋषि बहुत दुखी हो गए और सोचने लगे अब इस चूहे के आतंक से कैसे बचा जाए?

पराशर ऋषि श्री गणेश की शरण में गए। तब गणेश जी ने पराशर जी को कहा कि मैं अभी इस मूषक को अपना वाहन बना लेता हूं। गणेश जी ने अपना तेजस्वी पाश फेंका, पाश उस मूषक का पीछा करता पाताल तक गया और उसका कंठ बांध लिया और उसे घसीट कर बाहर निकाल गजानन के सम्मुख उपस्थित कर दिया। पाश की पकड़ से मूषक मूर्छित हो गया। मूर्छा खुलते ही मूषक ने गणेश जी की आराधना शुरू कर दी और अपने प्राणों की भीख मांगने लगा। गणेश जी मूषक की स्तुति से प्रसन्न तो हुए लेकिन उससे कहा कि तूने ब्राह्मणों को बहुत कष्ट दिया है मैंने दुष्टों के नाश एवं साधु पुरुषों के कल्याण के लिए ही अवतार लिया है, लेकिन शरणागत की रक्षा भी मेरा परम धर्म है, इसलिए जो वरदान चाहो मांग लो। ऐसा सुनकर उस उत्पाती मूषक का अहंकार जाग उठा, बोला, मुझे आपसे कुछ नहीं मांगना है, आप चाहें तो मुझसे वर की याचना कर सकते हैं। मूषक की गर्व भरी वाणी सुनकर गणेश जी मन ही मन मुस्कराए और कहा, ‘यदि तेरा वचन सत्य है तो तू मेरा वाहन बन जा।

मूषक के तथास्तु कहते ही गणेश जी तुरंत उस पर आरूढ़ हो गए। अब भारी भरकम गजानन के भार से दबकर मूषक को प्राणों का संकट बन आया। तब उसने गजानन से प्रार्थना की कि वे अपना भार उसके वहन करने योग्य बना लें। इस तरह मूषक का गर्व चूर कर गणेश जी ने उसे अपना वाहन बना लिया। तत्पश्चात मूषक श्री गणेश का प्रिय वाहन बना और इसका नाम डिंक पड़ा।

दूसरी कथा-

एक बार गजमुखासुर नाम के दैत्य ने अपने बाहुबल से देवताओं को बहुत परेशान कर दिया। सभी देवता एकत्रित होकर भगवान गणेश के पास मदद मांगने पहुंचे। तब भगवान श्रीगणेश ने उन्हें गजमुखासुर से मुक्ति दिलाने का भरोसा दिया तब श्रीगणेश का गजमुखासुर दैत्य से भयंकर युद्ध हुआ। कहते हैं उस युद्ध में श्रीगणेश का एक दांत टूट गया। तब क्रोधित होकर श्रीगणेश ने टूटे दांत से गजमुखासुर पर ऐसा प्रहार किया कि वह घबराकर चूहा बनकर भागा लेकिन गणेशजी ने उसे पकड़ लिया। मृत्यु के भय से वह क्षमा मांगने लगा तब श्रीगणेश ने मूषक रूप में ही उसे अपना वाहन बना लिया। यही मूषक श्री गणेश का प्रिय वाहन बना और इसका नाम डिंक पड़ा।