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होली पर रंगों में रमकर प्रसन्नचित्त हो जाएं

उत्सव कोई भी हो सभी उमंग का संचार करते हैं, खासकर होली तो तन और मन दोनों को ऊर्जा से सराबोर करती है

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Sunil Sharma

Mar 01, 2015

होलिका
भूतकाल की बोझिलता की प्रतिनिधि है, जो प्रहलाद के भोलेपन को नष्ट
करने के लिए प्रतिबद्ध है। किन्तु प्रहलाद नारायण की भक्ति में इतनी गहराई से स्थित
है कि सभी पुराने संस्कारों को, प्रभावों को मिटा देता है और आनंद खिल उठता है नए
रंगों के साथ।


होली रंगों का त्योहार है। यह संसार रंगों से भरा है।
प्रकृति की तरह ही हमारी भावनाओं तथा संवेदनाओं का रंगों से संबंध है। क्रोध का
लाल, ईष्र्या का हरा, आनंद और जीव ंतता के लिए पीला, प्रेम का गुलाबी, नीला
विस्तृतता के लिए, शांति के लिए सफेद, बलिदान का केसरिया और ज्ञान का जामुनी।
प्रत्येक मनुष्य एक रंगीन फव्वारा है, जिसके रंग बदलते रहते हैं।


पुराणों
में अनेक सुंदर दृष्टांत एवं कथाएं हैं। उसमें होली की भी एक कहानी है। असुरराज
हिरण्यकश्यप चाहता था कि सभी उसी की पूजा करें। परंतु उसका पुत्र प्रहलाद भगवान
विष्णु का भक्त था, जिनसे राजा की कट्टर दुश्मनी थी। क्रोधित राजा चाहता था कि उसकी
बहन होलिका, प्रहलाद से छुटकारा दिलाए। अग्नि को सहन करने कि शक्ति से युक्त
होलिका, प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि के कुंड में बैठ गई लेकिन होलिका जल गई,
प्रहलाद बच गया। हिरण्यकश्यप स्थूलता का प्रतीक है। प्रहलाद भोलेपन, श्रद्धा एवं
आनंद की प्रतिमूर्ति है। चेतना को केवल भौतिक पदार्थ के प्रेम तक ही सीमित नहीं रखा
जा सकता। हिरण्यकश्यप चाहता था कि उसका सारा आनंद भौतिक संसार से ही प्राप्त हो,
लेकिन ऎसा हुआ नहीं। जीवात्मा सदैव सांसारिक पदार्थों के बंधन में नहीं रह सकती।
स्वभावतया वह "नारायण", अपने उच्च स्वयं की ओर अग्रसित होगी ही।


होलिका
भूतकाल की बोझिलता की प्रतिनिधि है जो प्रहलाद के भोलेपन को नष्ट करने के लिए
प्रतिबद्ध है। किन्तु प्रहलाद नारायण की भक्ति में इतनी गहराई से स्थित है कि अपने
सभी पुराने संस्कारों को, प्रभावों को मिटा देता है और आनंद खिल उठता है नए रंगों
के साथ।

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