20 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Chaitra Navratri 2023: नवरात्रि के दूसरे दिन ऐसे करें मां ब्रह्मचारिणी की पूजा, कृपा से हर संकल्प होगा पूरा

Nav Durga में दूसरी, माता ब्रह्मचारिणी (Ma Brahmacharini Puja) हैं। माता का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है पहला ब्रह्म जिसका अर्थ है तपस्या, दूसरा चारिणी अर्थात आचरण करने वाली। आदि शक्ति ने इस स्वरूप में भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, इनकी पूजा चैत्र नवरात्रि 2023 (Chaitra Navratri 2023) के दूसरे दिन 23 मार्च को होगी। माता के इस रूप की पूजा से सभी सिद्धियां प्राप्त होती (Ma Brahmacharini Puja) हैं। माता ने इस स्वरूप में सीख दी है कि कठिन से कठिन संघर्ष में मन को विचलित नहीं होने देना चाहिए।

2 min read
Google source verification

image

Pravin Pandey

Mar 03, 2023

ma_brahmcharini_image.jpg

ma brahmcharini ki puja

माता ब्रह्मचारिणी का मंत्रः ब्रह्मचारिणी का अर्थ है जो ब्रह्म की प्राप्ति कराए, जो हमेशा नियम और संयम से चले। ब्रह्मचारिणी की पूजा पराशक्तियों को पाने के लिए की जाती है। इनकी कृपा से व्यक्ति को कई तरह की सिद्धियां मिलती हैं। माता के दाएं हाथ में जप माला और बाएं हाथ में कमंडल रहता है। नवरात्रि के दूसरे दिन साधक कुंडलिनी शक्ति जागृत करने के लिए इस स्वरूप की पूजा करते हैं। माता ब्रह्मचारिणी की पूजा के लिए इस मंत्र का जाप करना चाहिए।


1. दधाना करपद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतुमयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।


2. या देवी सर्व भूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

ये भी पढ़ेंः मां शैलपुत्री की ऐसे करें पूजा, इन मंत्रों से मां होंगी प्रसन्न

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा का महत्वः माता के इस स्वरूप की कृपा से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है, जिस पर माता की कृपा होती है उसको हर तरह की सफलता मिलती है और विजय प्राप्त होती है। इस दिन ऐसी कन्याओं का पूजन करना चाहिए, जिनका विवाह तय हो गया हो लेकिन शादी न हुई हो।

मां ब्रह्मचारिणी की पूजा विधिः मां ब्रह्मचारिणी की पूजा ऐसे करनी चाहिए।


1. एक फूल हाथ में लेकर माता का ध्यान करें और दधाना करपद्माभ्यामक्षमाला कमण्डलू। देवी प्रसीदतुमयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।। मंत्र बोलना चाहिए।
2. इसके बाद माता को पंचामृत स्नान कराएं और फल-फूल, अक्षत, कुमकुम सिंदूर अर्पित करें। देवी को सफेद और सुगंधित फूल चढ़ाएं। कमल का फूल भी अर्पित करना चाहिए।


3. इसके बाद या देवी सर्व भूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। मंत्र का जाप करें।
4. अब देवी मां को प्रसाद अर्पित करें, आचमन कराएं। पान-सुपारी भेंट करें, अपनी जगह पर ही खड़े होकर तीन बार प्रदक्षिणा करें।
5. घी और कपूर मिलाकर आरती करें, पूजा में त्रुटि के लिए क्षमा मांगें और प्रसाद बांटें।

ये भी पढ़ेंः Chaitra Navratri 2023: कब से शुरू हो रही चैत्र नवरात्रि 2023, क्यों करते हैं कलश स्थापना

कथाः आदिशक्ति ने हिमालय के घर में अवतार लिया था और इस स्वरूप में नारदजी के उपदेश के प्रभाव से शंकरजी को प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या की थी। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस स्वरूप में माता ने एक हजार वर्ष तक फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्ष तक जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। उपवास रखा और खुले आसमान के नीचे रहकर वर्षा और धूप को सहन किया।

तीन हजार वर्ष तक जमीन पर गिरे बेलपत्रों को खाकर भगवान शिव की तपस्या की। इसके बाद पत्ते खाना छोड़ दिया और कई हजार वर्ष तक निर्जल उपवास रखा, जिससे इनका नाम अपर्णा पड़ा। कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर क्षीण हो गया था। इस पर देवताओं और ऋषियों ने प्रकट होकर कहा-हे देवी ऐसी कठिन तपस्या तुम से ही संभव थी, तुम्हें चंद्र मौली शिव जरूर प्राप्त होंगे। घर लौट जाओ।