Falgun Kanwar Yatra शुरू हो गई है। अलग-अलग तरह से भक्तों को जल लेकर जाते और आते देखेंगे तो आइये बताते हैं कि कितने प्रकार की कांवड़ यात्रा होती (types of Kanwar Yatra)है और क्या हैं कांवड़ यात्रा के नियम।
Kanwar Yatra: सावन और फाल्गुन महीने में कांवड़िये आपने देखे होंगे, कोई दौड़ता हुआ आगे बढ़ता है तो कोई जत्थे में आराध्य के अभिषेक का जतन करता है, क्या आपको मालूम है ये कांवड़ यात्रा कितने प्रकार की होती है और कांवड़ यात्रा के नियम क्या हैं।
सामान्य कांवड़िये अपनी यात्रा के दौरान जहां चाहें रूककर आराम कर सकते हैं। यात्रा के रास्ते में लगे पंडालों में ये रूकते हैं और आराम के बाद आगे का सफर शुरू करते हैं।
डाक कांवड़ यात्रा में यात्री शुरुआत से शिव के जलाभिषेक तक बिना रूके चलते रहते हैं। इनके लिए मंदिरों में विशेष इंतजाम किए जाते हैं। उनके लिए लोग रास्ता बना देते हैं, ताकि वे शिवलिंग तक बिना रूके चलते रहें।
इसमें भक्त खड़ी कांवड़ लेकर चलते हैं। उनकी मदद के लिए कोई न कोई सहयोगी साथ चलता है। जब कांवड़िया आराम करता है तो साथी कांवड़ अपने कंधे पर रखकर खड़ी अवस्था में चलने के अंदाज में कांवड़ को हिलाता रहता है।
इसमें भक्त नदी तट से शिवधाम तक दंड देते हुए पहुंचते हैं और कांवड़ पथ की दूरी को अपने शरीर की लंबाई से मापते हुए पूरी करते हैं। ये बहुत कठिन कांवड़ यात्रा होती है और इसमें महीनों का समय लग जाता है।
जानकारों के अनुसार कांवड़ यात्रा के नियम काफी कठिन हैं। यात्रा के दौरान किसी प्रकार का नशा, मांस, मदिरा का सेवन वर्जित है। बिना स्नान को कांवड़ स्पर्श पर रोक है, इस दौरान चर्म का स्पर्श नहीं कर सकते।
कांवड़ यात्रा पैदल करनी चाहिए, वाहन चारपाई का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। वृक्ष के भी नीचे कांवड़ नहीं रखनी चाहिए और कांवड़ को कांधे पर ही रखना चाहिए। इसे सिर के ऊपर नहीं रखना चाहिए।
हिंदू धर्म मानने वालों की कांवड़ यात्रा का बहुत महत्व है। पिछले साल 2022 में सावन की कांवड़ यात्रा की चर्चा दुनिया भर के मीडिया आउटलेट्स ने की थी। जापान में तो बिहार मूल के 300 लोगों ने टोक्यो से 100 किमी दूर साइतामा स्थित मंदिर तक कांवड़ यात्रा भी निकाली थी और भारत-जापान दोस्ती की 70वीं वर्षगांठ मनाई थी।