
जानिए आखिर कैसे हुई रंग वाली होली की शुरुआत
हिंदू धर्म में सालों से होली का त्योहार बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता रहा है। यह पर्व हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस वर्ष रंग वाली होली यानि धुलन्डी 18 मार्च को मनाई जाएगी। होली के दिन सभी खाते-पीते और नाचते-गाते ही नजर आते हैं। रंग वाली होली से एक दिन पहले होलिका दहन करने की परंपरा भी है। वैसे तो ये त्योहार सामान्य तौर पर 2 दिन का मनाया जाता है परंतु कई स्थानों पर तो होली के पांचवे दिन को भी रंग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। सालों से बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक रहा ये त्योहार रिश्तों में और मिठास घोल देता है। साथ ही माना जाता है कि इस दिन शुभ मुहूर्त और सही विधि द्वारा होलिका पूजन करने से सभी गृह दोषों से मुक्ति मिलती है और जीवन में खुशियों का वास होता है।
आमतौर पर होली का नाम आते ही सबके मन में विभिन्न रंगों की छवि उभर आती है क्योंकि रंगों के बिना ये त्योहार ही अधूरा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पूरे देश में अलग-अलग तरह से मनाए जाने वाले इस त्योहार में रंगों का इतना महत्व क्यों है। तो आइए जानते हैं कि आखिर रंग कैसे बने होली का हिस्सा...
मान्यता है कि रंग वाली होली की शुरुवात होने के पीछे की कहानी भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी है। प्रेम का प्रतीक माने जाने वाले श्री कृष्ण मथुरा में होली का त्योहार रंगों से ही मनाते थे। साथ ही कृष्ण जी गोकुल और वृंदावन में भी अपने मित्रों और सगे-संबंधियों के साथ रंग में सराबोर होकर इसे पर्व की तरह मनाते थे। उन्हें ऐसा करते देख धीरे-धीरे समुदाय में भी लोगों ने रंगों से होली मनानी शुरू कर दी। जिसके बाद से ही इसने एक प्रथा का रूप ले लिया।
और आज का वक्त है जब रंगों के साथ-साथ दुनिया भर में होली का त्योहार हर संस्कृति को छूता नजर आता है। बरसाने के साथ मथुरा-वृंदावन की होली देखने हर साल देश-विदेश से लोग आते हैं। इस त्योहार में सभी अपने भीतर की कड़वाहट को भूलकर कर मस्ती में साथ-साथ झूम उठते हैं। वहीं इस त्योहार के आगमन के साथ ही सर्दियां भी खत्म हो जाती हैं। खेतों में नई फसल होने के साथ ही किसानों के चेहरे खिल उठते हैं। होली के त्योहार को वसंतोत्सव के नाम से भी जाना जाता है।
Updated on:
17 Mar 2022 05:53 pm
Published on:
17 Mar 2022 05:52 pm
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