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अमर है पृथ्वी का ये पेड़! जानें क्यों होती है इसकी पूजा

- हिन्दू धर्म के लगभग हर ग्रंथ में इस वृक्ष यानि वट वृक्ष के बारे में लिखा मिलता है।

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Deepesh Tiwari

Nov 17, 2022

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सनातन धर्म में पेड़, वनस्पति आदि की भी पूजा की जाती है। इन्हीं पेड़ों में जहां पीपल अति पूजनीय माना जाता है, वहीं वट वृक्ष यानि बरगद के पेड़ की महिलाएं वट सावित्री व्रत के दिन पूजा करतीं हैं। दरअसल वट वृक्ष हिन्दू धर्म के सर्वाधिक महत्वपूर्ण और पवित्र वनस्पतियों में से एक है। अश्वत्थ (पीपल) और तुलसी के साथ वट वृक्ष, अर्थात बरगद के पेड़ की हिन्दू धर्म में अत्यधिक महत्ता है। हिन्दू धर्म के लगभग हर ग्रंथ में वट वृक्ष के महत्त्व के विषय में लिखा गया है। केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं अपितु जैन और बौद्ध धर्म में भी वट वृक्ष की अद्भुत महत्ता बताई गयी है।

वैसे तो वट वृक्ष का वैज्ञानिक महत्त्व भी बहुत अधिक है किन्तु पहले बात करते हैं उसके धार्मिक महत्त्व की। वट वृक्ष को त्रिमूर्ति का प्रतीक है। इसके छाल में भगवान विष्णु, जड़ में परमपिता ब्रह्मा और शाखाओं में भगवान शंकर निवास करते हैं। अग्नि पुराण के अनुसार वट वृक्ष उत्सर्जन और तेज का प्रतिनिधित्व करता है इसीलिए संतान प्राप्ति हेतु इस वृक्ष की पूजा का विधान है।

वट वृक्ष की संरचना जटाओं सी होती है इसीलिए शिव पुराण में इसे साक्षात् जटाजूट महादेव का रूप बताया गया है। इसके दर्शन को साक्षात् भगवान रूद्र के समान बताया गया है। पद्म पुराण में इसे भगवान विष्णु का रूप भी बताया गया है, हालाँकि श्रीहरि को मूलतः अश्वत्थ (पीपल) से जोड़ा जाता है।

अश्वत्थरूपी विष्णु: स्याद्वरूपी शिवो यत:

अर्थात: पीपल विष्णु रूपी एवं वट जटारूपी शिव हैं।


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ये वृक्ष अमरता का भी प्रतीक है। इसे अमर माना जाता है क्यूंकि इस वृक्ष की आयु सहस्त्रों वर्षों की होती है। इसी कारण इसका एक नाम "अक्षयवट" भी है, अर्थात जिसका क्षय नहीं होता। कुछ ग्रंथों में ये भी कहा गया है कि प्रलय के समय काशी के अतिरिक्त केवल अक्षयवट ही सुरक्षित रहता है।

वट वृक्ष की उत्पत्ति के विषय में एक कथा हमें वामन पुराण में मिलती है। इस ग्रन्थ में सर्वप्रथम भगवान विष्णु की नाभि से कमल के पुष्प कर भगवान ब्रह्मा प्रकट हुए। तत्पश्चात विभिन्न देवताओं के शरीर से अनेकानेक वृक्षों एवं वनस्पतियों की उत्पत्ति हुई। उसी समय यक्षों के सम्राट "मणिभद्र" से वट वृक्ष की उत्पत्ति हुई। तभी से वट वृक्ष को यक्षवास, यक्षतरु, यक्षवारूक आदि नामों से भी पुकारा जाता है।

यक्षाणामधिस्यापि मणिभद्रस्य नारद।
वटवृक्ष: समभव तस्मिस्तस्य रति: सदा।। - वामन पुराण

हरिवंश पुराण में "भण्डीरवट" नामक एक वट वृक्ष का वर्णन है जिसकी सुंदरता पर मुग्ध होकर स्वयं श्रीकृष्ण ने उसके नीचे विश्राम किया था। रामायण में "सुभद्रवट" नामक एक वट वृक्ष का वर्णन है जिसकी शाखा गरुड़ ने अपनी शक्ति से तोड़ डाली थी। रामायण में ही "श्यामन्यग्रोध" नाम के वट वृक्ष का वर्णन है जो वर्तमान काल में अक्षयवट के नाम से प्रसिद्ध है और पंचवटों में से एक है। श्रीराम ने भी अपने वनवास का एक लम्बा समय पंचवटी में बिताया था जिसका नाम वहां पर उपस्थित पांच वट वृक्षों के कारण पड़ा था।

एक मान्यता ये भी है कि प्रलय के समय जब सम्पूर्ण पृथ्वी जलमग्न हो जाती है तब पृथ्वी पर केवल एक वट वृक्ष ही बचता है। जब प्रलय समाप्त होता है तब उसी वट वृक्ष के पत्ते पर शिशु रूप में भगवान श्रीहरि प्रकट होते हैं। उनकी लीला अद्भुत होती है, वे अपने पैर का अंगूठा चूस रहे होते हैं। फिर उन्ही की नाभि से कमल का एक पुष्प उत्पन्न होता है जिसपर परमपिता ब्रह्मा विराजमान रहते हैं। उसी समय ब्रह्मदेव समस्त प्राणियों की पुनः रचना करते हैं।

वट वृक्ष के सन्दर्भ में सत्यवान और सावित्री की कथा भी प्रमुख है। सत्यवान के प्राण यमराज ने वट वृक्ष के नीचे ही लिए था और फिर सावित्री के हठ और पतिव्रत के कारण उन्होंने उसे पुनर्जीवित किया। तब यमराज ने सावित्री को ये वरदान दिया कि वट सावित्री के दिन जो स्त्री वट वृक्ष की पूजा करेगी उसका सुहाग दीर्घायु होगा। तभी से वट सावित्री के व्रत को करने का विधान है। इसके साथ ही वट वृक्ष में सावित्री का निवास भी माना जाता है। वट सावित्री पर एक विस्तृत लेख आप यहां पढ़ सकते हैं।

ऐसा माना जाता है कि जो कोई भी वट वृक्ष लगाता है वो मृत्युलोक से छूट कर सीधा शिवलोक जाता है। वट वृक्ष को काटना पुत्र हत्या के समान बताया गया है। जैन धर्म के अनुसार उनके प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने वट वृक्ष के नीचे ही अपनी तपस्या पूर्ण की थी। ठीक उसी प्रकार बौद्ध धर्म के अनुसार गौतम बुद्ध को गया में वट वृक्ष के नीचे ही ज्ञान की प्राप्ति हुई थी जिसे बोधिवृक्ष कहा जाता है।

धार्मिक मान्यताओं के अतिरिक्त वट का वैज्ञानिक महत्त्व भी है। बरगद उन चुनिंदा वृक्षों में है जो दिन में 20 से अधिक घंटों तक ऑक्सीजन का उत्सर्जन करता है। आयुर्वेद के अनुसार शरीर के तीन मुख्य अवयवों - वात, पित्त और कफ को नियंत्रित करने में वट वृक्ष अत्यंत प्रभावकारी है। इसकी छाल और पत्तियों ने अनेक औषधियां बनाई जाती है। वट वृक्ष अपने आस-पास की वायु को शुद्ध रखता है। इसके अतिरिक्त इसे जीवन का आधार भी माना जाता है क्यूंकि इसके विशाल शाखाओं पर असंख्य जीव अपना निर्वहन करते हैं। इस पर उन्हें घर और भोजन दोनों प्राप्त होता है।

वट वृक्ष भारत का राष्ट्रीय वृक्ष भी है। विश्व का सबसे प्राचीन वट वृक्ष प्रयागराज में स्थित "अक्षयवट" माना जाता है जो रामायण काल से आज तक उपस्थित है। वहीँ विश्व का सबसे बड़ा वट वृक्ष आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले में स्थित "थिम्माम्मा मर्रीमनु" नामक वट वृक्ष है जो इतना विशाल है कि उसकी छाया लगभग पांच एकड़ तक फैली रहती है। १९८९ में इसे गिनीज बुक और वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया था।

वट वृक्ष के सन्दर्भ में हमें "पंचवटों" का वर्णन मिलता है जो आदि काल से आज तक उपस्थित हैं। ये हैं - अक्षयवट, पंचवट, वंशीवट, गयावट और सिद्ध वट।