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कश्यप ऋषि ने इस मास में सुन्दर कश्मीर की रचना की थी

अगहन मास को मार्गशीर्ष इसलिए कहा जाता है क्योंकि मार्गशीर्ष भी श्रीकृष्ण का रूप है

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हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार 13 नवंबर ( बुधवार ) से मार्गशीर्ष ( अगहन ) मास शुरू हो रहा है। यह महीना 12 दिसंबर ( गुरुवार ) तक रहेगा। शास्त्रों में इस महीने को भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप कहा गया है। इस महीने में शंख पूजन का विशेष महत्व है। आइये जानते हैं इस महीने की विशेषता...


सतयुग में देवों ने मार्गशीर्ष मास की प्रथम तिथि को ही वर्ष प्रारंभ किया।

इसी मास में कश्यप ऋषि ने सुन्दर कश्मीर प्रदेश की रचना की।

इसी मास में महोत्सवों का आयोजन करना चाहिए। ऐसा करना अत्यं‍त शुभ होता है। भगवान विष्णु का उपवास करना चाहिए।

मार्गशीर्ष शुक्ल 12 को उपवास प्रारम्भ कर प्रति मास की द्वादशी को उपवास करते हुए कार्तिक की द्वादशी को पूरा करना चाहिए।

प्रति द्वादशी को भगवान विष्णु के केशव से दामोदर तक 12 नामों में से एक-एक मास तक उनका पूजन करना चाहिए।

मार्गशीर्ष की पूर्णिमा को चन्द्रमा की अवश्य ही पूजा की जानी चाहिए, क्योंकि इसी दिन चन्द्रमा को सुधा से सिंचित किया गया था।

इस दिन माता, बहन, पुत्री और परिवार की अन्य स्त्रियों को एक-एक जोड़ा वस्त्र देना चाहिए। इस मास में नृत्य-गीतादि का आयोजन कर उत्सव भी करना चाहिए।

अगहन मास की पूर्णिमा को ही 'दत्तात्रेय जयंती' मनाई जाती है।

अगहम मास में विष्णुसहस्त्र नाम, श्रीमद्भगवद्गीता और गजेन्द्रमोक्ष को दिन भर में 2-3 बार अवश्य पढ़ें।

अगहन मास में 'श्रीमद्भगवद्गीता' ग्रन्थ को देखने भर की विशेष महिमा है।

स्कन्द पुराण के अनुसार, घर में अगर श्रीमद्भगवद्गीता हो तो अगहन मास में दिन में एक बार उसको प्रणाम करना चाहिए।

अगहन मास में अपने गुरु को, इष्ट को 'ऊँ दामोदराय नमः' कहते हुए प्रणाम करने से जीवन के अवरोध समाप्त हो जाता है।

अगहन मास में शंख में तीर्थ का पानी भरें और घर में जो पूजा का स्थान है उसमें भगवान के ऊपर से शंख मंत्र बोलते हुए घुमाएं।

बाद में शंख का यह जल घर की दीवारों पर छीटें। ऐसा करने से घर में शुद्धि बढ़ती है, शांति आती है और क्लेश दूर हो जाते हैं।

अगहन मास को मार्गशीर्ष इसलिए कहा जाता है क्योंकि मार्गशीर्ष भी श्रीकृष्ण का रूप है।