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शनि व शुक्र आपकी कुंडली में हैं कितने असरकारक, जानें यहां

शुक्र व शनि की दशा, अंतरदशा के प्रभाव...

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यूं तो ज्योतिष में शनि को न्याय का देवता माना जाता है और वहीं शुक्र को भाग्य का कारक... लेकिन क्या आप जानते हैं कि शनि व शुक्र का विचित्र संबंध भी है। कुंडली में इनका बनने वाला योग तकरीबन सबसे प्रभावी व मजबूत योग तक माना जाता है।

शुक्र और शनि का मेल दिलाता है धन-वैभव...

- यदि कुंडली में शुक्र और शनि एकसाथ हों और अन्‍य सभी ग्रह भी शुभ स्‍थान में बैठे हों तो उस व्‍यक्‍ति को सभी प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्‍ति होती है।

- कुंडली में शुक्र और श‍नि के लग्‍न स्‍थान में हों तो जातक को स्त्री सुख, सुंदर रूप, सुख, धन, नौकर आदि प्राप्त होते हैं।

- कुंडली में शुक्र और शनि के चौथे घर में होने पर उस व्‍यक्‍ति को अपने किसी मित्र से धन की प्राप्‍ति होती है। वह अपने भाइयों से आदर और मान-सम्मान प्राप्त करता है।

यदि किसी की कुंडली में शुक्र और शनि सप्‍तम भाव में विराजमान हों तो वह व्यक्ति स्त्री सुख, धन, सम्पत्ति और सभी भौतिक सुखों को भोगता है।

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दरअसल शनि को “सौरमंडल का गहना” (jewel of the Solar System) कहा जाता है क्योंकि इनके चारों ओर अनेक सुन्दर वलय परिक्रमा करते हैं। खगोलीय दृष्टिकोण से शनि एक गैसीय ग्रह है और शनि को सूर्य से जितनी ऊर्जा मिलती है उससे तीन गुनी ऊर्जा वह परावर्तित करता है। जानकारों के अनुसार एक ओर जहां शनि को नैसर्गिक रूप से सर्वाधिक अशुभ ग्रह माना गया है जो दुःख, बुढ़ापा, देरी, बाधा आदि का प्रतिनिधित्व करता है।

वहीं शनि की शुभ स्थिति और स्वामित्व एकाकीपन, स्थिरता, संतुलन, न्यायप्रियता, भय-मुक्ति, सहिष्णुता, तप आदि की प्रवृत्ति भी देते हैं। गोचर में शनि को काल का प्रतिनिधि माना गया है।

वहीं दूसरी ओर शुक्र सांसारिक ग्रह हैं परन्तु अति कठिन, इन्द्रिय-मन संग्रह के कारण इन्हें मोक्ष का कारक भी माना जाता है। प्रेम, कला, कामेच्छा, आमोद-प्रमोद, भोग, सुगंध, आकर्षक वस्त्र, सामाजिकता, राजसिक प्रवृत्ति आदि शुक्र के कारकत्व हैं।

इनको असुर-गुरु की संज्ञा भी प्राप्त है। शुक्र का विवाह और अन्य सभी शुभ कार्यों में महत्व है और उनके अस्त होने पर कोई सांसारिक शुभ कार्य करना वर्जित है।

ऐसे में शनि-शुक्र के परस्पर संबंध शनि-शुक्र की परस्पर महादशा या अन्तर्दशा का विशेष नियम भी है। दरअसल शनि व शुक्र दोनों एक-दूसरे के परस्पर नैसर्गिक मित्र हैं और पंचधा में भी एक-दूसरे के शत्रु नहीं बन सकते। शनि, शुक्र स्वामित्व राशि तुला में उच्च के होते हैं, क्योंकि शनि वायु तत्व प्रधान ग्रह हैं और तुला वायु तत्व प्रधान राशि है।

इसके अलावा शनि तुला में 200 पर परम उच्च अवस्था में स्वाति नक्षत्र में होते हैं, जिसके अधिष्ठाता वायु देव हैं। वहीं शनि को सैनिक माना गया है और शुक्र राजसिक प्रवृत्ति के असुर गुरु हैं जिनके पास भोग-विलास के सभी साधन उपलब्ध हैं, इसीलिए शनि को शुक्र की तुला राशि में भोग-विलास के अतिरिक्त शक्तिशाली असुर गुरु का संरक्षण भी प्राप्त होता है। परस्पर दशा का विचित्र नियम बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् के अथ दशाफलाध्यायः के अनुसार ग्रहों के स्वभाववश और स्थानादिवश दो प्रकार के दशाफल होते हैं। ग्रहों की दशा के फल उनके बलानुसार ही होते हैं।

शनि-अन्तर्दशा-फलाध्याय के अनुसार शनि की दशा में शुक्र का अंतर हो और शुक्र यदि केंद्र, त्रिकोण, स्वराशि, एकादश भाव में शुभ दृष्ट हो तो स्त्री-पुत्र, धन, आरोग्य, घर में कल्याण, राज्यलाभ, राजा की कृपा से सुख सम्मान, वस्त्राभूषण, वाहनादि अभीष्ट वस्तु का लाभ और उसी समय अगर गुरु भी अनुकूल हो तो भाग्योदय, संपत्ति की वृद्धि होती है। यदि शनि गोचर में अनुकूल हो तो राजयोग या योग क्रिया की सिद्धि होती है। यह है दशाफल का साधारण नियम। परस्पर दशा-अन्तर्दशा में कौन किसके फल देगा, इसका उल्लेख लघुपाराशरी की कारिका 40 में है:

परस्परदशापो स्वभुक्तौ सूर्यज्ञभार्गवो। व्यत्ययेन विशेपेण प्रदिशेतां शुभाशुभम्।। इसके अनुसार सूर्यज (सूर्य पुत्र शनि) और भार्गव (शुक्र) अपना शुभाशुभ फल परस्पर दशाओं में देते हैं अर्थात, शनि का फल शुक्रांतर में और शुक्र का फल शन्यांतर में मिलेगा। अतः दोनों की परस्पर दशा-अंतर्दशा विशेष शुभ या विशेष अशुभ फल देती है। शुक्र स्वामित्व राशि वृषभ या तुला लग्न में शनि हो, तो क्रमशः नवमेश-दशमेश और चतुर्थेश-पंचमेश होकर योगकारक होते हैं।

इसी प्रकार शनि स्वामित्व राशि मकर या कुम्भ लग्न में शुक्र हो तो क्रमशः पंचमेश-दशमेश और चतुर्थेश-नवमेश होकर योगकारक होते हैं। पंडित सुनील शर्मा के अनुसार उत्तर कालामृत के दशाफल खंड की कारिका 29 और 30 में शनि व शुक्र की परस्पर दशा का एक विचित्र नियम लिखे हैं जो अनेक कुंडलियों में परखने के बाद खरा उतरता है और सामान्य नियम में विपरीत है: भृग्वार्की यदि तुघõमे स्वभवने वर्गोत्तमादो स्थितौ तुल्यौ योगकरौ तथैव बलिनौ तौ चेन्मियो पाकगो। भूपालो धनदोपमोऽपि सततं भिक्षाशनो निष्फलः तत्रैकस्तु बली परस्तु विबलश्चेद्वीर्यवान्योगदः।। 29 ।।

1. शनि व शुक्र दोनों ही अगर उच्चक्षेत्री, स्वराशिस्थ, मित्रराशिगत, वर्गोत्तम, शुभ स्थानगत आदि हों तो इनकी परस्पर दशा-अन्तर्दशा में कुबेर के समान धनी राजा भी भिक्षवत् हो जाता है। यदि एक बलवान व दूसरा निर्बल हो तो परस्पर दशा-अन्तर्दशा में फल देते हैं। तौ द्वावप्यबलौ व्ययाष्टरिपुगौ तद्भावपौ वाऽपि तत् त˜ावेशयुतौ दा शुभकरौ सौख्यप्रदौ भोगदौ

।। एकः स˜ावनाधिपस्तदपरश्चेद्दुष्टभा वेश्वर स्तावप्यत्र सुयोगदावतिखलौ तौ चेन्महासौख्यदौ।। 30 ।।


2. यदि शनि व शुक्र बलरहित हों, त्रिक भावों में स्थित हों या त्रिक भावेश हों या त्रिक भावेशों से युत हों तो इनकी परस्पर दशा-अन्तर्दशा में शुभ फल, सुख और भोग प्राप्त होते हैं अर्थात शनि-शुक्र की परस्पर दशा-अन्तर्दशा की विशेषता यही है कि अगर दोनों अशुभ हों तो बहुत शुभ फल प्राप्त होते हैं।