13 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

हिंदू धर्म में देवताओं की संख्या को ऐसे समझें, जानें क्या है 33 कोटि देवताओं का रहस्य

- इन देवताओं को वर्णन धर्म ग्रंथ खासकर पुराणों में मिल जाएगा।

4 min read
Google source verification

image

Deepesh Tiwari

Nov 21, 2022

33_koti_dev.jpg

सनातन धर्म को दुनिया का सबसे प्रचीन धर्म होने की मान्यता प्राप्त है। जानकारों के अनुसार इस धर्म का नाम ही सनातन है, जिसका अर्थ होता है जो हमेशा था, है और रहेगा। जानकारों का कहना है कि कालान्तर यानि काफी समय बाद धीरे धीरे इसे ही हिन्दू धर्म कहा जाने लगा। इसकी विशालता का अंदाजा इसी से बात से लग जाता है कि हिन्दू धर्म में कुल देवी देवताओं की संख्या 33 कोटि बताई जाती है।

इसी 33 कोटि के आधार पर लोग इसमें 33 करोड़ देवी देवताओं के होने की बात कहते है जो सुनने में कुछ अजीब सा लगता है? ऐसे में मन में स्वत: ही ये प्रश्न उठता है कि क्या ये संभव है कि किसी धर्म में देवी देवताओं की संख्या 33 करोड़ हो? इस पर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है। लेकिन कई धर्म के जानकारों का कहना है कि इसका कारण अधूरा ज्ञान है जो हानिकारक हो सकता है। तो चलिए आज हम जानते है कि इसके पीछे वास्तविकता क्या है...

इस संबंध में पंडित सुनील शर्मा का कहना है कि हिन्दू धर्म में कुल 33 करोड़ देवी देवता हैं, ये बात बिलकुल भी सत्य नहीं है। मैंने कई धर्म गुरुओं को पूरे विश्वास के साथ ये कहते सुना जाता है कि ये संख्या सटीक रूप से 33 करोड़ ही हैं। किन्तु जब कई जानकारों से इनका नाम पूछा जाता है तो 33 देवी देवताओं का नाम बताने में ही उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ेगी। यहां एक समस्या ये भी है कि लोग देवता और भगवान में अंतर ही नहीं कर पाते।

यहां ये जान लें कि वेद, पुराण, गीता, रामायण, महाभारत या किसी भी अन्य धार्मिक ग्रन्थ में ये नहीं लिखा कि हिन्दू धर्म में 33 करोड़ देवी देवता हैं और यही नहीं देवियों को कहीं भी इस गिनती में शामिल नहीं किया है। माना जाता है कि इतनी विशाल संख्या देखते हुए मुमकिन है, उन्हें बाद में इस सूची में शामिल कर लिया गया होगा।

वहीं पंडित एसके त्रिवेदी का कहना है कि हमारे धर्म ग्रंथों में 33 करोड़ नहीं बल्कि "33 कोटि" देवताओं (ध्यान रहे, देवता न कि भगवान) का वर्णन है। ध्यान दें कि यहां "कोटि" शब्द का प्रयोग किया गया है, करोड़ का नहीं। संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते हैं: पहला करोड़ व दूसरा प्रकार।

आज हम जिसे करोड़ कहते हैं, पुराने समय में उसे कोटि कहा जाता है। युधिष्ठिर ने ध्यूत सभा में अपने धन का वर्णन करते समय कोटि शब्द का प्रयोग किया है। दुर्भाग्य है कि आधुनिक काल के विद्वानों ने कोटि का अर्थ सीधा सीधा अनुवाद कर करोड़ कर दिया।

ऐसे में हिंदू धर्म के अधिकांश जानकारों का मानना है कि यहाँ कोटि का प्रयोग 33 करोड़ नहीं बल्कि 33 (त्रिदशा) "प्रकार" के देवताओं के लिए किया गया है। कोटि का एक अर्थ "प्रकार" (तरह) भी होता है। उस समय जब देवताओं का वर्गीकरण किया गया तो उसे 33 प्रकार में विभाजित किया गया, जो समय के साथ अपभ्रंश होकर कब "करोड़" के रूप में प्रचलित हो गया पता ही नहीं चला। पंडित एचएस शर्मा के अनुसार इन 33 कोटि (करोड़ नहीं) देवताओं को वर्णन आपको किसी भी धर्म ग्रंथ खासकर पुराणों में मिल जाएगा।

Must Read-घर के पूजा स्थल पर न रखें देवी-देवताओं की इस रूप में मूर्ति,अन्यथा...

इनमें 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रूद्र और दो अश्विनी कुमार मिलकर 33 (12+8+11+2 = ३३) देवताओं की एक श्रेणी बनाते हैं और 33 कोटि देवताओं का सन्दर्भ इन्हीं 33 देवताओं से है।

12 आदित्य :-

महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री अदिति से उत्पन्न ये 12 पुत्र आदित्य कहलाते हैं। अपनी माता अदिति के कारण उन्हें आदित्य कहा जाता है। वैसे तो देवताओं की संख्या कहीं अधिक है किन्तु आदित्यों में इन 12 देवताओं की ही गिनती होती है। इन्हें ही देवता कहा जाता है। इंद्र देवताओं के राजा कहलाते हैं। ये 12 आदित्य वर्ष के 12 मासों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जिनमें इंद्र,धाता,पर्जन्य,त्वष्टा,पूषा ,अर्यमा,भग,विवस्वान (सूर्य),अंशुमान,मित्र,वरुण,विष्णु शामिल हैं।

8 वसु :-

ये भगवान विष्णु और देवराज इंद्र के रक्षक माने जाते हैं। रामायण में इन्हें महर्षि कश्यप और दक्षपुत्री अदिति का पुत्र बताया गया है, किन्तु महाभारत में इन्हें ब्रह्मपुत्र मनु की संतान कहा गया है। ये पंचमहाभूतों (पृथ्वी, अग्नि, जल, पवन और आकाश) और तीन मुख्य खगोलीय पिंडों - सूर्य, चंद्र और नक्षत्रों का प्रनिधित्व करते हैं।
1. आप: जल का प्रनिधित्व करते हैं।
2. ध्रुव: नक्षत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
3. सोम: चंद्र का प्रतिनिधित्व करते हैं।
4. धर: पृथ्वी का प्रतिनिधित्व करते हैं।
5. अनिल: पवन का प्रतिनिधित्व करते हैं।
6. अनल: अग्नि का प्रतिनिधित्व करते हैं।
7. प्रत्युष: सूर्य का प्रतिनिधित्व करते हैं।
8. प्रभास: आकाश का प्रतिनिधित्व करते हैं। यही वो वसु हैं जिन्हें श्राप के कारण गंगापुत्र भीष्म के रूप में जन्म लेना पड़ा था।

Must Read- आदि पंचदेव: पूजा में रखें इन खास बातों का ध्यान

11 रूद्र :-

ये भगवान शंकर के दूसरे रूप माने जाते हैं इसी कारण भगवान शंकर को हम "महारुद्र" भी कहते हैं। कहा जाता है कि इनकी सभी की उत्पत्ति भगवान शंकर से ही हुई है। वामन पुराण में इन्हें महर्षि कश्यप और अदिति का पुत्र कहा गया है। इन्हें परमपिता ब्रह्मा और सुरभि (सभी गायों की माता) की संतान भी माना जाता है।

1. शम्भू
2. पिनाकी
3. गिरीश
4. स्थाणु
5. भर्ग
6. भव
7. सदाशिव
8. शिव
9. हर
10. शर्व
11. कपाली

2 अश्विनी कुमार :-

इन्हें देवताओं का राजवैद्य माना जाने के साथ ही औषधियों का स्वामी माना जाता है। ये दो जुड़वे भाई हैं (जिनमें नासत्य बड़े हैं) जिनके माता पिता विवस्वान और सरन्यू हैं। ये सूर्योदय (नासत्य) और सूर्यास्त (दसरा) का प्रनिधित्व करते हैं।

नासत्य: महाभारत में ये माद्रीपुत्र नकुल के रूप में जन्में।
दसरा: महाभारत में ये माद्रीपुत्र सहदेव के रूप में जन्में।

पंडित बीएन पंत के अनुसार इस प्रकार ये 33 कोटि देवताओं का वर्णन है, जो देवताओं का केवल एक समूह है। इनके अतिरिक्त भी कई और देवी देवता भी माने जाते हैं।