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जन्माष्टमी के दिन एक बार जरूर पढ़ें ये 5 श्लोक, जीवन को बना देंगे सफल

मनुष्य के जीवन को सफल बना सकते हैं ये महत्वपूर्ण श्लोक

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भोपाल

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Tanvi Sharma

Aug 22, 2019

bhagwat geeta slokas

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श्रीमद्भगवद्गीता का सनातन धर्म में बहुत अधिक महत्व माना जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता ( shrimad bhagwat geeta ) दुनिया के श्रेष्ठ ग्रंथों में से एक है, इसे पढ़ने के साथ-साथ सुनी भी जाती है। वहीं कहा जाता है कि, गीता के उपदेशों अनुसरण करने से व्यक्ति के जीवन में खुशहाली आ सकती है। कलयुग में श्रीकृष्ण ( shree krishna ) का महात्म्य और बढ़ेगा। श्रीकृष्ण सिर्फ कर्म करने की प्रेरणा देते हैं। बताया गया है कि जीवन के हर पहलू को गीता से जोड़कर उसकी व्याख्या की जा सकती है। वहीं पंडित रमाकांत मिश्रा के अनुसार भगवन गीता के 5 ऐसे श्लोक ( Slokas of bhagavad gita ) बताए गए हैं, जिन्हें यदि मनुष्य अपने जीवन में उतार ले तो उसका जीवन बदल सकता है। आइए हम आपको बताते हैं इन श्लोकों का मतलब...

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यूं तो भगवत गीता श्लोकों का समुंदर है, लेकिन इनमें से 5 ऐसे श्लोक बताए गए हैं जो कि मानव जीवन के लिए सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। ये श्लोक दुनिया में सबसे अधिक आध्यात्मिक और दार्शनिक ग्रंथ गीता के श्लोक समुंदर से हमने निकाले हैं। जन्माष्टमी ( janmahtami 2019 ) पर आप उन्हें पढ़कर कृष्ण को और अधिक ढंग से समझ सकेंगे और साथ ही कृष्ण द्वारा बताए गए जीवन के महत्वपूर्ण उपदेशों से जीवन को सफल भी बना पायेंगे....

इस श्लोक का अर्थ है: आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न आग उसे जला सकती है। न पानी उसे भिगो सकता है, न हवा उसे सुखा सकती है। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा के अजर-अमर और शाश्वत होने की बात की है।)

इस श्लोक का अर्थ है: यदि तुम (अर्जुन) युद्ध में वीरगति को प्राप्त होते हो तो तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि विजयी होते हो तो धरती का सुख को भोगोगे... इसलिए उठो, हे कौन्तेय (अर्जुन), और निश्चय करके युद्ध करो। (यहां भगवान श्रीकृष्ण ने वर्तमान कर्म के परिणाम की चर्चा की है, तात्पयज़् यह कि वर्तमान कर्म से श्रेयस्कर और कुछ नहीं है।)

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इस श्लोक का अथज़् है: हे भारत (अर्जुन), जब-जब धर्म ग्लानि यानी उसका लोप होता है और अधर्म में वृद्धि होती है, तब-तब मैं (श्रीकृष्ण) धर्म के अभ्युत्थान के लिए स्वयम् की रचना करता हूं अर्थात अवतार लेता हूं।

इस श्लोक का अर्थ है: सज्जन पुरुषों के कल्याण के लिए और दुष्कमिज़्यों के विनाश के लिए... और धर्म की स्थापना के लिए मैं (श्रीकृष्ण) युगों-युगों से प्रत्येक युग में जन्म लेता आया हूं।

इस श्लोक का अर्थ है: कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, लेकिन कर्म के फलों में कभी नहीं... इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो और न ही काम करने में तुम्हारी आसक्ति हो। (यह श्रीमद्भवद्गीता के सर्वाधिक महत्वपूर्ण श्लोकों में से एक है, जो कर्मयोग दर्शन का मूल आधार है।)