रीवा। बरकत का मतलब है बढ़ोतरी या इजाफा। यहां यह जानना जरूरी है कि बरकत दरअसल पाकीजगी (पवित्रता) से ताल्लुक रखती है। पवित्रता होगी तो बरकत होगी। खुलासा यह है कि पाकीजगी और बरकत एक ही सिक्के के दो पहलू है। कहा भी जाता है कि पाकीजगी आधा ईमान है। पाकीजगी अल्लाह (ईश्वर) को पसंद है। हिंदी में अर्थ है कि पवित्रता से परमात्मा प्रसन्न होता है। इसका मतलब यह हुआ कि पवित्रता यानी पाकीजगी होगी तो अल्लाह की रहमत होगी। अल्लाह की रहमत (दिव्य कृपा) होगी तो बेशक बरकत होगी। कुल मिलाकर यह कि बरकत तभी होगी जब नीयत और नीति नेक होगी। अमूमन लोग कहते हैं कि 'हम इतना कमाते हैंÓ लेकिन कमाई में बरकत ही नहीं, यानी सब खर्च हो जाता है, बचता ही नहीं। इसका जवाब यह है कि हरकत गलत होगी तो बरकत नहीं होगी। नेक नीयत और नेक कोशिश से की गई नेक कमाई से बरकत होती है। तक्वा (सदाचार) के साथ रखा गया रोज़ा दरअसल बरकत ही बरकत है। इसे यूं समझिए कि रोज़ा नेकी की नींव पर बनी हुई ईमान की इमारत है, जिसकी छत है बरकत। दसवां रोज़ा रहमत के अशरे (कालखंड) में आखिरी पड़ाव है। इसलिए बरकत तो होगी, लेकिन नेक कमाई और नेक अमल शर्त है। पवित्र कुरआन में जिक्र है, 'पवित्र चीजें (ईमान की रोटी) खाओ।
गौरतलब है कि हर मजहब का ग्रंथ ईमान की रोटी पर ही जोर देता है। जैसे सनातन धर्म के अथर्ववेद के सातवें कांड का पावन मंत्र है कि पुण्य की कमाई मेरे घर की शोभा बढ़ाए। हदीस कहती है कि रोज़ा यानी बरकत ही बरकत।
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