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नवजात को जन्म देने के बाद प्रसूता की मौत

रीवा के मऊगंज सीएचसी का मामला, स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप
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रीवा

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Dilip Patel

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Updated: 12 Jul 2018, 3:33 PM IST

maternal death after giving birth to newborn

maternal death after giving birth to newborn

रीवा। मऊगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अंतर्गत नवजात को जन्म देने के छह घंटे के भीतर प्रसूता की मौत हो गई जिससे स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया। मामले में सीएमएचओ ने बीएमओ से रिपोर्ट तलब की है।
जानकारी के अनुसार, दामोदरगढ़ निवासी प्रसूता संजू पाण्डेय पत्नी विपिन पाण्डेय (20) प्रसव पीड़ा पर मंगलवार की रात 8 बजे मऊगंज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराई गई। उसने बुधवार सुबह 7.30 बजे एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। जन्म के बाद प्रसूता भी स्वस्थ थी। लेकिन नवजात के जन्म के कुछ घंटे बाद परिजन उसे घर लेकर चले गए। अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सिंग स्टॉफ ने भी उसे जाने से नहीं रोका। दोपहर 11 बजे घर पहुंचते ही उसकी हालत बिगड़ गई। ब्लीडिंग शुरू होते ही परिजनों के होश उड़ गए। फौरन उसे लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे। जहां मौजूद डॉक्टर ने गंभीर स्थिति देखते हुए गांधी स्मारक चिकित्सालय के लिए रेफर कर दिया। परिजन आधे रास्ते ही पहुंचे थे कि प्रसूता ने एंबुलेंस में दम तोड़ दिया। प्रसूता की मौत होने के बाद स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है। प्रसव केंद्र जाकर जन्म के फौरन बाद वापस घर लौट जाना, इस मामले ने स्वास्थ्य महकमे की कथनी करनी को उजागर किया है। यह संकेत है कि अस्पतालों में डॉक्टर और नर्सिंग स्टॉफ देखभाल में लापरवाही बरत रहे हैं।
बीएमओ से रिपोर्ट तलब
मामले में प्रभारी सीएमएचओ डॉ. संजीव शुक्ल ने मऊगंज सीएचसी के बीएमओ डॉ. पंकज सिंह गहरवार से रिपोर्ट तलब की है। प्रभारी सीएमएचओ का कहना है कि प्रथम दृष्टया आशा कार्यकर्ता की गलती सामने आ रही है। बीएमओ ने बताया है कि परिजन बिना बताए अस्पताल से प्रसूता को लेकर चले गए थे। मामले की जांच कराई जाएगी। प्रसव के 48 घंटे बाद ही जच्चा-बच्चा को अस्पताल से छुट्टी दी जानी चाहिए थी। किस स्तर पर लापरवाही हुई है इसका पता लगाकर जिम्मेदारों पर कार्रवाई की जाएगी।
45 फीसदी प्रसव घरों में
जिले में प्रसव केंद्र भले ही 32 हों लेकिन 45 प्रतिशत प्रसव घरों में ही हो रहे हैं। ये रिपोर्ट भी सामने आ चुकी है। सरकार संस्थागत प्रसव बढ़ाने पर जोर देती है। जननी सुरक्षा योजना के नाम पर जिले में हर साल छह करोड़ रुपए खर्च होते हैं फिर भी ये स्थिति बरकरार है।