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मायावती के सियासी दांव से विंध्य में बदले समीकरण

राजनीतिक उठापटक : बसपा के अकेले चुनाव लडऩे से कांग्रेस की बढ़ेंगी मुश्किलें, भाजपा की भी राह नहीं होगी आसान

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Mayawati's Political Bid Change Vindya to Equation

Mayawati's Political Bid Change Vindya to Equation


रीवा . बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने मध्यप्रदेश में अकेले चुनाव लडऩे का ऐलान कर दोनों प्रमुख दलों भाजपा और कांग्रेस को असमंजस में डाल दिया है। दोनों दलों को अब फिर से नई रणनीति बनानी पड़ रही है। खासतौर पर विंध्य क्षेत्र जहां बसपा का अपना प्रभाव है, यहां अब तक भाजपा यह मानकर चल रही थी कि बसपा और कांग्रेस का गठबंधन हुआ तो मुकाबला सीधा होगा, जिससे दोनों दलों के असंतुष्टों को साधने के साथ ही अन्य रणनीति पर काम शुरू कर दिया था।


कांग्रेसी भी उन सीटों में अधिक मेहनत नहीं कर रहे थे जहां बसपा का अधिक प्रभाव है। वहां के दावेदार यह मानकर चल रहे थे कि समझौते में बसपा को यह सीट जाएगी। इस बात का जैसे ही मायावती ने ऐलान किया कि वह अकेले चुनाव लड़ेंगी तो हलचल बढ़ गई है। रीवा और सतना में कई ऐसी सीटें हैं जहां बसपा चुनाव जीतती आई है या फिर उसके प्रत्याशी निकटतम रहे हैं। बसपा के नेताओं को यह आभाष पहले ही हो गया था कि उनके वोट तो कांग्रेस को ट्रांसफर हो जाएंगे लेकिन बदले में कांग्रेसी वोट उन्हें नहीं मिलेंगे। इससे संगठन कमजोर होने की आशंका थी। जिसकी वजह से मायावती ने अकेले चुनाव लडऩे का ऐलान कर दिया है। माना जा रहा है कि विधानसभा में दबाव बनाकर लोकसभा में अधिक सीटें कांग्रेस से लेने के पक्ष में बसपा है।


भाजपा की बढऩी थी मुश्किलें
बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और बसपा के वोट शेयर मिला दें तो भाजपा प्रत्याशियों से काफी अधिक होता है, ऐसे में मुश्किलें भाजपा की बढऩे की संभावना थी। अधिकांश स्थानों पर दोनों के वोट शेयर 50 प्रतिशत से ज्यादा था।

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अकेले लडऩे पर :

पिछले 2013 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने मनगवां सीट अपने नाम की थी। इसके अलावा देवतालाब, सेमरिया, रीवा में दूसरे नंबर पर रही। अन्य सीटों में भी बेहतर प्रदर्शन रहा है। पार्टी का मानना है कि जहां निकटतम थे, उसमें इस बार जीत हासिल होगी।


तीसरे मोर्चे की संभावना

एससीएसटी एक्ट के विरोध में सवर्ण आंदोलन विंध्य में अधिक जोर पकड़ रहा है। ऐसे में बसपा को भरोसा है कि भाजपा के मूल वोटरों का बंटवारा होने से उसे फायदा होगा। वह सवर्ण प्रत्याशियों पर भी भरोसा जता कर, तीसरे विकल्प के रूप में सामने आना चाहती है।

महागठबंधन का गणित

बसपा की नजर लोकसभा चुनाव पर भी है। पार्टी नहीं चाहती कि किसी राज्य में गठबंधन करके कुल वोट प्रतिशत कम किया जाए। लोकसभा चुनाव में महागठबंधन की स्थिति में भी उसकी अच्छी हिस्सेदारी पर नजर है, ताकि गठबंधन सरकार की स्थिति में वह मजबूत रहे।

कांग्रेस का विकल्प पूरी तरह नहीं बंद

विंध्य के कांग्रेस नेताओं का मानना है अभी विकल्प पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। भले पूर्ण गठबंधन न हो लेकिन बसपा की वजह से कांग्रेस से छिटकी सीटों पर अंतिम समय पर समझौते की संभावना खुली है। रीवा की चार सीटों पर ही प्रत्याशी घोषित किए गए हैं, जहां कांग्रेस मजबूत है अब तक प्रत्याशी बसपा ने नहीं घोषित किया।


पिछले चुनाव के आंकड़ों के हिसाब से भाजपा को होता बड़ा नुकसान
सिरमौर- 34.33 प्रतिशत वोट लेकर भाजपा के दिव्यराज सिंह विधायक बने, जबकि कांग्रेस 29.79, बसपा का 19.57 का मिलाकर 49.36 प्रति. होता है।
सेमरिया- यहां भाजपा को 30.14 प्रतिशत वोट मिले थे, नीलम मिश्रा विधायक हैं। बसपा का 25.16 और कांग्रेस का 23.99 प्रतिशत था।
त्योंथर- भाजपा के 36.83 प्रतिशत के मुकाबले कांग्रेस का 28.73 एवं बसपा का 20.55 प्रतिशत था।
मऊगंज- कांग्रेस के 33.23 प्रतिशत और बसपा के 14.46 प्रति. के मुकाबले भाजपा का 24.04२४.०४ प्रतिशत रहा।
देवतालाब- भाजपा के 30.04 के मुकाबले बसपा का 26.85 और कांग्रेस का 24.72 प्रतिशत वोट रहा।
मनगवां- यहां बसपा का 33.69 और कांग्रेस के 25.63 के मुकाबले भाजपा का 33.46 प्रतिशत वोट रहा है।
रीवा- यहां भाजपा अधिक मजबूत थी, उसे 51.48 के मुकाबले बसपा को 20.05 और कांग्रेस को 17.24 प्रतिशत मिले थे।
गुढ़- यहां कांग्रेस के 25.50 और बसपा के 19.73 के मुकाबले भाजपा के 24.46 प्रतिशत वोट थे।