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आपातकाल के 45 वर्ष : उस समय सच बोलने की अनुमति नहीं थी, जिसने हिम्मत दिखाई वह जेल गया

- 25 जून 1975 को लगाए गए आपातकाल में रीवा में सैकड़ों लोगों को जेल में बंद कर दिया गया था

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रीवा

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Mrigendra Singh

Jun 25, 2020

rewa

National emergency 25 june 1975, indira gandhi pm in india



रीवा। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में 25 जून 1975 का दिन काला दिवस के रूप में याद किया जाता है। इस दिन आपातकाल की घोषणा की गई थी, जिसके बाद से सरकार का पूरी तरह से नियंत्रण कामकाज पर हो गया था। उस दौरान सरकार के खिलाफ बोलने को राष्ट्रद्रोह माना जाता था।

सरकार के कई ऐसे कार्य थे जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं कहे जा सकते। इसलिए सच कहने की भी इजाजत नहीं दी गई थी। उस दौर में जिसने भी सच कहने की हिम्मत दिखाई, वह सरकार के विरोध के साथ देश का विरोध माना गया। इसलिए मीसा कानून के तहत उन सभी को जेल में बंद कर दिया गया, जो सरकार के खिलाफ मुखर होकर आवाज उठा रहे थे।

रीवा शहर में भी सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ तो करीब एक हजार से अधिक की संख्या में अलग-अलग स्थानों से लोगों को गिरफ्तार कर जेल में डाला गया। कुछ को केन्द्रीय जेल रीवा में रखा गया तो अधिकांश को जबलपुर भेज दिया गया था। इसके अलावा बढ़ती संख्या को देखते हुए सैकड़ा भर से अधिक तत्कालीन नेताओं को अलग-अलग जेलों में भेजा गया। रीवा में किशोर अवस्था के नौजवानों से लेकर 75 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्गों तक को जेल में डाला गया। करीब डेढ़ से दो वर्ष तक जेल में रहने के बाद 21 मार्च 1977 को जब सरकार ने आपातकाल वापस लिया तो लोगों की रिहाई भी की गई।

- रीवा में इन लोगों ने आंदोलन का किया था नेतृत्व
सरकार के खिलाफ देश भर में चल रहे आंदोलन का केन्द्र रीवा भी था। जिसका नेतृत्व करीब दर्जन भर से अधिक लोग कर रहे थे। जिसमें प्रमुख रूप से चंद्रमणि त्रिपाठी, रामलखन सिंह, प्रेमलाल मिश्रा, चारू झा, मणिराज सिंह, अच्छेलाल सिंह, लक्ष्मीकिशोर श्रीवास्तव, श्रीमूर्ति आचार्य, राघव ताम्रकार, रघुनंदन ताम्रकार, बसंत प्रसाद गुप्ता, सीता प्रसाद शर्मा(उक्त सभी अब दिवंगत), कौशल सिंह, रामलखन शर्मा, रमानिवास शुक्ला, इंजी. रामसिया सिंह, बृहस्पति सिंह, जनार्दन मिश्रा, अजय खरे, बद्री तिवारी, रामेश्वर सोनी, रामायण पटेल सहित अन्य शामिल थे।

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आपातकाल में लोकतांत्रिक मूल्यों का पूरी तरह से गला घोंटा गया था, जनचेतना को दबाने का प्रयास था। देश की तरक्की पूर्णिमासी की ओर जा रही थी तो उसे अमावस्या में बदलने का काम किया था कांग्रेस की सरकार ने। लाखों लोग प्रभावित हुए थे। 17 महीने मैं भी जेल में रहा और हर प्रताडऩा का डटकर सामना किया था। लोकतंत्र का वह काला अध्याय था।
जनार्दन मिश्रा, सांसद एवं मीसाबंदी

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जून में वारंट जारी हो गया लेकिन हम लोगों का आंदोलन चलता रहा। सितंबर में मेरी और चंद्रमणि त्रिपाठी की गिरफ्तारी हुई। जेल के भीतर ही हम लोगों ने अनशन शुरू कर दिया जो २३ सितंबर तक चला। उस दौरान कलेक्टर ने मीसाबंदियों पर लाठी चलवाई थी। घायल मीसाबंदियों का मेडिकल परीक्षण कराने के लिए अनशन किया गया था।
रामसिया सिंह, मीसाबंदी
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जेल गए 45 साल हो गए हैं लेकिन 25 जून 1975 से लेकर डेढ़ वर्ष का हर घटनाक्रम अब तक याद है। तानाशाही का दौर था, हम सब युवा थे पुरजोर तरीके से आवाज उठाई। यह पता था कि आवाज उठाने पर गिरफ्तारी होगी फिर भी हमने सच बोला और जेल भेजे गए थे। जेपी के दिल्ली आंदोलन में भी हम लोग गए थे।
सुभाष श्रीवास्तव, मीसाबंदी
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आपातकाल के समय कालेज में पढ़ता था, हम सब लगातार आंदोलन चला रहे थे। 28 जुलाई की रात्रि जब घर पहुंचा तो पुलिस पहुंच गई और गिरफ्तार कर लिया। 18 महीने जेल में रहा, वह समय ऐसा रहा जो कभी नहीं भूल सकता। सरकार ने माहौल बनाया था कि जीवन भर जेल में रखेगी फिर हम नहीं डरे और जेल के भीतर भी विरोध जारी रखा।
बद्री प्रसाद तिवारी, मीसाबंदी
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हम सब अन्याय का विरोध करते रहे हैं चाहे जिस दल की सरकारें हों। ऐसे में आपातकाल के दौरान टारगेट में आ गए थे। गिरफ्तारी कर जेल भेजा गया, वहां भी अन्याय के खिलाफ आवाज मुखर की। साथ ही तिलक, गांधी, भगत सिंह आदि के संघर्षों से जुड़ी पुस्तकों का भी अध्ययन करते रहे। वहां हमारा समय व्यर्थ नहीं रहा। हम तो पूरा जीवन बिताने के लिए तैयार थे।
बृहस्पति सिंह, मीसाबंदी