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अजब-गजब परिणाम : मध्यप्रदेश की यह विधानसभा सीट सत्ता के विपरीत चुनती है विधायक

- जिला बनाने की मांग को लेकर भी चलता रहा है आंदोलन

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रीवा

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Mrigendra Singh

Dec 13, 2018

rewa

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रीवा। रीवा जिले की मऊगंज विधानसभा सीट से लंबे अंतराल से सत्ताधारी दल का विधायक नहीं चुना गया। प्रदेश में जिस दल की सरकार होती है, उसके विपरीत ही मऊगंज की जनता विधायक का चुनाव करती रही है। इस बार भी वही परिणाम दोहराया गया है।
1985 से अब तक लगातार विपक्ष में बैठने वाले दलों के विधायकों का चुनाव जनता करती रही है। 85 में अर्जुन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी तो मऊगंज में भाजपा के जगदीश तिवारी विधायक बने, 1990 में सुंदरलाल पटवा की सरकाई आई तो उदयप्रकाश मिश्रा कांग्रेस के विधायक बने। 1993 में कांग्रेस के दिग्विजय सिंह की सरकार दस वर्ष रही तो बसपा के आइएमपी वर्मा विधायक चुने जाते रहे। 2003 में भाजपा की सरकार आई तब भी बसपा के विधायक वर्मा ही चुने गए। 2008 में भारतीय जनशक्ति पार्टी के लक्ष्मण तिवारी तो 2013 में कांग्रेस के सुखेन्द्र सिंह बन्ना विधायक निर्वाचित हुए। भाजपा ने इस 15 वर्ष के दौरान अपना विधायक बनाने पुरजोर प्रयास भी किया। इसके पहले 1967 में जब कांग्रेस की सरकार थी तब जनसंघ के जगदीश प्रसाद विधायक बने थे।

जिला बनाने की मांग नहीं हो पाई पूरी
मऊगंज को जिला बनाने की मांग लंबे समय से चल रही है। पूर्व में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा था कि उनका विधायक चुना गया तो मऊगंज को जिला बनाएंगे। जब जनता ने भाजपा का विधायक नहीं चुना तो वह आश्वासन भूल गए। 2013 में कांग्रेस के विधायक चुने गए सुखेन्द्र सिंह बन्ना ने कई बार विधानसभा में मांग उठाई। स्थानीय स्तर पर भी आंदोलन किया। इसके पहले लक्ष्मण तिवारी भी आंदोलन चलाते रहे हैं लेकिन भाजपा में शामिल होने के बाद सत्ता के दबाव में आकर वह भी अपनी मांग को भूल गए। इस बार भी शिवराज ने कहा था कि मऊगंज से भाजपा जीती तो जिला बनाएंगे। लोगों ने विधायक तो चुन दिया लेकिन वह खुद सरकार से बाहर हो गए।

अनशनकारी प्रत्याशी को मिले 235 वोट
जिला न्यायालय भवन यथावत रखने की मांग को लेकर 408 दिन तक लगातार धरने पर बैठे रहे अधिवक्ता विजय मिश्रा भी रीवा विधानसभा क्षेत्र से प्रत्याशी थे। उन्हें महज 235 वोट ही हासिल हुए। जितने दिन वह धरने पर रहे उतने वोट भी हाशिल नहीं कर पाए। यह मुद्दा जब आंदोलन के चरम पर था, उस दौरान वकीलों द्वारा दावा किया जा रहा था कि रीवा की राजनीति में परिवर्तन यही आंदोलन लाएगा। विजय कोर्ट परिसर के बाहर अधिवक्ताओं के कहने पर धरने पर बैठे, उन्हें समर्थन भी वकीलों का मिलता रहा। चुनाव लड़ाने की योजना भी अधिवक्ताओं के ही एक वर्ग ने बनाई थी। जिसके चलते वह बतौर प्रत्याशी नामांकन दाखिल कर दिए। इसके बावजूद शहर में कहीं भी चुनाव प्रचार के लिए नहीं निकले। उनका कहना था कि वकीलों ने ही नामांकन दाखिल कराया है, वही प्रचार भी करेंगे। इस बीच कुछ वकील चुनाव परिणाम के पहले दावा कर रहे थे कि भारी वोटों का समर्थन मिला है। चुनाव परिणाम आने के बाद मणिपुर की इरोम शर्मिला जैसा हश्र यहां भी हुआ। वह भी 16 वर्ष तक भूख हड़ताल में रही, आखिर में समर्थकों ने चुनाव लड़ाया, जिसमें उन्हें महज 90 वोट हाशिल हुए थे। चुनाव में खराब प्रदर्शन पर विजय मिश्रा कहते हैं कि उनकी कोई राजनीतिक महत्वकांछा नहीं रही, लोगों ने दबाव बनाया तो नामांकन दाखिल कर दिया था।
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13 में से एक भी महिला को नहीं मिली जीत
इस बार विधानसभा चुनाव में 13 महिला प्रत्याशियों ने नामांकन दाखिल किया था। जिसमें केवल तीन का प्रदर्शन ही मुकाबले में रहा। अन्य का प्रदर्शन भी कमजोर रहा। पिछले विधानसभा चुनाव में मनगवां और सेमरिया के लोगों ने महिला ्रप्रत्याशियों को चुना था। इसके पहले भी महिला विधायक चुनी जाती रही हैं लेकिन इस बार एक भी महिला विधायक नहीं चुनी गई। इस बार मनगवां में दो, सिरमौर में दो, देवतालाब में पांच, रीवा में दो, सेमरिया एवं त्योंथर में एक-एक प्रत्याशी ही महिला थी। इसमें से सिरमौर में कांग्रेस की अरुणा तिवारी, मनगवां में कांग्रेस की बबिता साकेत और देवतालाब में बसपा की सीमा सिंह निकटतम प्रतिद्वंदी रहीं।