23 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

एमपी के इस जिले में तेजी से बढ़ रही है ये बीमारी, कहीं आप भी इसके शिकार तो नहीं

विश्व क्षय दिवस पर विशेष: 2005 में शुरू हुआ था रीवा में राष्ट्रीय टीबी रोग नियंत्रण कार्यक्रम, १४ साल बाद भी रोगियों की स्थिति जस की तस  

3 min read
Google source verification

रीवा

image

Dilip Patel

Mar 24, 2018

This disease is growing  in district of mp, where you are also patient

This disease is growing in district of mp, where you are also patient

रीवा में १४ साल पहले टीबी की रोकथाम के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू हुआ था। सरकार ने करोड़ों रुपए खर्च कर दिए पर स्थिति नहीं सुधरी। टीबी रोगियों का कुनबा घटने की बजाय बढ़ता जा रहा है। बीते सात साल से हर वर्ष तीन हजार से अधिक नए टीबी रोगी सामने आ जाते हैं। विश्व क्षय दिवस पर पेश है रिपोर्ट...।

रीवा। राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम की रिपोर्ट के मुताबिक रीवा जिले में 2011 में 3890 रोगी सामने आए थे इसके बाद टीबी की रोकथाम के लिए बजट बढ़ा दिया गया था। तब से हर साल लगभग एक करोड़ रुपए जिले में टीबी रोग नियंत्रण पर खर्च किया जा रहा है लेकिन परिणाम अच्छे नहीं हैं। करीब 60 लाख रुपए कर्मचारियों के वेतन पर, 20 लाख रुपए ट्रीटमेंट सपोर्टर को दवा खिलाने के लिए खर्च होता है। इसके अलावा डाट्स केंद्रों पर सरकार दवाएं अलग से मुहैया कराती हैं। मरीजों की जांच के लिए जरूरी उपकरणों से लेकर हर ब्लॉक में डाट्स केंद्र मौजूद हैं। इतना सब होने के बावजूद टीबी रोगियों की संख्या कम नहीं हो रही है। आंकड़ों पर गौर करें तो 2011 में 3890 रोगी, 2012 में 4272 रोगी, 2013 में 3305 रोगी, 2014 में 3223 रोगी, 2015 में 3304 रोगी, 2016 में 3445 रोगी और 2017-़18 में 3721 रोगी स्वास्थ्य विभाग के पन्नों में दर्ज हो चुके हैं। अर्थात बीते सात साल से हर साल तीन हजार से अधिक नए टीबी रोगी सामने आ रहे हैं। भले ही सरकार ने करोड़ों रुपए खर्च कर दिए हों पर आंकड़े बता रहे हैं कि जिले में टीबी रोग नियंत्रण से बाहर है।


एमडीआर अवस्था में 66 रोगी
रीवा जिले में एमडीआर अवस्था में 71 टीबी रोगी चिह्नित हैं। जिनमें से 5 रोगियों की मौत हो चुकी है। 66 रोगी मौत के मुहाने पर हैं। ये वर्ष 2017 की रिपोर्ट है। एमडीआर, टीबी की सबसे खतरनाक अवस्था होती है। इसमें टीबी रोग की सामान्य दवाएं असर नहीं करती हैं। इसके लिए विशेष दवा खिलाई जाती है।

कितनी भयावह...जानें ये भी
-जनसंख्या की दृष्टि से 1 लाख की आबादी में 216 टीबी के रोगी पाए जाते हैं।
-बहुत से नए रोगियों में जीवाणु नहीं दिखते लेकिन सीने के एक्स-रे में बीमारी पता चलती है।
-देश में प्रतिदिन 20 हजार लोगों में टीबी जीवाणु का संक्रमण होता है जिनमें 5 हजार से अधिक लोग टीबी ग्रस्त हो जाते हैं।
-देश में प्रति तीन मिनट में दो लोगों की मौत टीबी से हो रही है।
-कुपोषित बच्चों में टीबी तेजी से फैल रहा है। 10-15 प्रतिशत कुपोषित टीबी की चपेट में पाए जाते हैं।
-डायबिटीज मरीज में टीबी के जीवाणु पाए जा रहे हैं जो आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती है।

ये होते हैं लक्षण:--
-दो सप्ताह से अधिक की खांसी।
-शाम के समय थोड़ा बुखार आना।
-भूख न लगना, वजन में कमी होना।
-छाती में दर्द व खांसी में खून का आना।

वर्तमान में सरकार ने उठाए ये कदम
-उच्च गुणवत्ता युक्त डेली डाट्स की औषधियां दी जा रही हैं।
-टीबी रोगियों को इलाज के लिए प्रतिमाह 500 रुपए दिए जा रहे हैं।
-निजी चिकित्सकों को टीबी रोगियों की सूचना देने पर 100 रुपए मिलेंगे।
-टीबी रोग की सूचना न देने पर डॉक्टर को छह माह की सजा होगी।
-दवा विक्रेता, केमिस्ट को रजिस्टर में दवा लेने वाले टीबी रोगी का नाम लिखना होगा।
-एमडीआर रोगियों को 24 माह के स्थान पर 9 माह नई औषधियां खिलाई जाएगी।


न पड़ें अंधविश्वास में, लें नियमित दवाएं
लोग टीबी की बीमारी का इलाज नियमित नहीं कराते हैं। वे अंधविश्वास और हकीमों के चक्कर में पड़ कर बीच में डाट्स की दवाएं बंद कर देते हैं। ओझा से टीबी झरवाने में न पड़ें। टीबी की बीमारी डाट्स की दवाएं नियमित लेने अर्थात पूरा कोर्स करने पर ठीक हो जाती है। टीबी रोग की रोकथाम में रोगी स्वयं भूमिका निभाए। घर के अन्य सदस्य से दूर रहे। बच्चों को संपर्क में न आने दें। यह संक्रामक बीमारी है। सांस के माध्यम से फैलती है। लक्षण समझ में आते ही सीबी नॉट मशीन से जांच कराएं। संजय गांधी अस्पताल की ओपीडी में सुबह 8.30 बजे से दोपहर 2 बजे तक यह जांच होती है।
डॉ. बीएल मिश्रा, जिला क्षय रोग अधिकारी रीवा।