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रीवा में वनों के जल स्त्रोतों को पुनर्जीवन के साथ नए सिरे से किया जाएगा विकसित, ऐसे होंगे प्रयास

- जंगलों में बाउली बनाई जाएगी और झरनों की होगी सफाई- वन विभाग ने मोहनिया घाटी के जंगल से की इसकी शुरुआत्र

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रीवा

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Mrigendra Singh

Mar 15, 2020

rewa

Water resources of forests will be developed with renewal, forest rewa

रीवा। जिले के जंगलों में लगातार घटते जलस्त्रोतों को लेकर विभाग ने नए विकल्पों की तलाश शुरू कर दी है। इसके लिए जिले भर के जंगलों में सर्वे करने के बाद कई प्रमुख स्थानों पर पुराने जलस्त्रोतों को पुनर्जीवित करने की योजना शुरू की गई है। साथ ही जंगलों के बीच नए सिरे से जल स्त्रोत विकसित करने की भी तैयारी की जा रही है। इसकी शुरुआत कर दी गई है। रीवा-सीधी के सीमावर्ती क्षेत्र मोहनिया घाटी के कैमोर पहाड़ में कई स्थानों को चिन्हित किया गया है, जहां पर जलस्त्रोतों को विकसित किया जाएगा।

रीवा-सीधी मार्ग में कैमोर पहाड़ में हनुमान मंदिर के नजदीक कुछ झरने ऐसे हैं जो हर समय बहते हैं। बीते कुछ समय से यहां पर गर्मी के दिनों में झरने बंद होने लगते थे। जिससे जंगल के जानवरों को पीने के पानी की समस्या उत्पन्न होती है। इस वजह से अब वन विभाग ने इन झरनों की सफाई का कार्य प्रारंभ कराया है। श्रमिकों के जरिए अभी कार्य किया जा रहा है, बताया जा रहा है कि बाद में जेसीबी से यहां पर एक बाउली खोदी जाएगी और उसमें जानवरों के उतरने के लिए भी स्थान बनाया जाएगा। इसी तरह से जंगल के बीच स्थित बरसाती नालों और अन्य झरनों की भी सफाई कराई जाएगी ताकि उनसे पानी निकलने लगे और गर्मी के दिनों में भी वहां पर पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध रहे। इस तरह की व्यवस्था जिले के अन्य हिस्सों में भी अपनाई जाएगी। बताया जा रहा है कि इसके पहले सेमरिया क्षेत्र के ककरेड़ी एवं आसपास के जंगलों में भी जानवरों को पानी उपलब्ध कराने के लिए प्रयास किए गए हैं। ऐसे ही प्रयास हनुमना अंचल के पिपराही क्षेत्र के जंगलों में भी हुए हैं। बता दें कि रीवा जिले में भौगोलिक क्षेत्र 6314 वर्ग किलोमीटर है और इसमें वन क्षेत्र 781.15 वर्गमीटर है।
- गर्मी के दिनों में जंगल छोड़ गांवों की ओर भागते हैं जानवर
गर्मी के दिनों में जंगल में पानी की कमी की चलते उसकी तलाश में जानवर गांवों की ओर भागते हैं। इसी वजह से वह कई बार गांव में भटक कर बस्तियों के बीच पहुंच जाते हैं और कभी ग्रामीणों तो कभी कुत्तों के हमले का शिकार हो जाते हैं। बीते कई वर्षों से इस तरह की स्थितियां बनी हुई हैं। जंगलों से शाकाहारी जानवरों सुअर, हिरण, नीलगाय के साथ ही कई बार तेंदुआ, लकड़बग्घा सहित अन्य जानवर गांवों की ओर पहुंचने लगते हैं। कुछ वर्षों से जिले के जंगलों में बाघों की आहट भी देखने को मिल रही है। सेमरिया, सिरमौर, अंतरैला, मोहनिया, गोविंदगढ़ आदि के जंगलों के आसपास पानी की तलाश में बाघों को भी भटकते हुए देखा गया है।


- रीवा जिले के जंगलों में जानवरों की संख्या
रीवा जिले में जंगलों में रह रहे जानवरों की संख्या पूर्व में जारी की गई थी, जिसके अनुसार तेंदुआ 8, भालू 42, नीलगाय 3852, ***** 1374, भेडिय़ा 24, लकड़बग्घा 128, चीतल 108, सांभर 186, हिरण 76, चौसिंगा 11, चिंकारा 92, लोमड़ी 147, सियार 779, मोर 328 आदि हैं। कुछ क्षेत्रों में बाघ भी देखे जा रहे हैं लेकिन उनकी गणना की रिपोर्ट अभी विभाग की ओर से जारी नहीं की गई है।