
जिला मुख्यालय से करीब 32 किलोमीटर दूर स्थित ऐतिहासिक स्थल गौरीदंत है। यहां घने जंगल के बीच करीब 700 फीट ऊंची पहाड़ी पर मां गौरी की पाषाण प्रतिमा है, जिसे एक शक्तिपीठ के रूप में भी पूजा जाता है। पहाड़ पर प्राकृतिक गुफाओं के साथ शैलाश्रय हैं और इन पर शैलचित्र के साथ कई शिलालेख और स्तूपनुमा आकृतियां हैं, लेकिन रखरखाव के अभाव में यह सब धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे हैं। प्राकृतिक सुंदरता को देखते हुए इसे संरक्षित कर एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है।
सागर-रहली रोड स्थित बरौदा गांव से बंसिया, नारायणपुर गांव होते हुए जंगलों के रास्ते गौरीदंत तक पहुंच सकते हैं। यहां करीब दो किलोमीटर पैदल चलना होगा, इसके बाद जंगल के बीच स्थित करीब 700 फीट ऊंची पहाड़ी की चढ़ाई शुरू होगी। रानगिर की ओर इस चोटी पर करीब दो फीट चौड़ी खोह है, जिसमें लोहे की अस्थाई सीढ़ी लगा दी गई हैं। इससे करीब 15 फीट उतरने पर खड़े पहाड़ के किनारे पर पहुंच जाते हैं, जहां से चारों ओर घना जंगल दिखाई देता है। यहीं बाजू में एक गुफा है, जो इतनी संकरी है कि बैठे-बैठे खिसककर ही 12-14 फीट तक जाना होता है। इसके बाद टॉर्च की रोशनी में करीब 15 फीट गहरी संकरी गुफा दिखती है। अंदर एक और गहरी गुफा है, जो 30-40 फीट गहरी है। बताया जाता है कि एक पेड़ की जड़ इस गुफा के साथ-साथ नीचे उतरी है, जिसके सहारे ही अंदर उतरा जा सकता है।
सांची के बाद सागर जिले में बौद्ध अनुयायियों के विहार के प्रमाण मिले हैं। गौरीदंत पहाड़ी पर स्तूप है, वहां पर बौद्ध अनुयायियों द्वारा बनाए गए मठ के अवशेष भी मिले हैं। यह करीब 800 साल पुराना बताया जा रहा है। यहां जो प्रमाण मिले हैं, इतिहासकार और पुरातत्ववेता उन्हें बिहार के साक्ष्य के रूप में स्वीकार भी कर रहे हैं। डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. नागेश दुबे का कहना है कि इतिहासकारों ने जो लिखा है उसके मुताबिक सांची जहां वर्तमान में बौद्ध स्तूप हैं, वहां से भरहुत जाने के मार्ग में यह जगह पड़ती थी। विभाग के ही शोधार्थी रहे और वर्तमान में यहीं शिक्षक डॉ. मशकूर अहमद कादरी बताते हैं कि शैलाश्रय में मिले शिलालेख 5 से 6 हजार साल पुराने हैं। पहाड़ी पर बौद्ध स्तूप के भी प्रमाण मिले हैं, लेकिन वह क्षतिग्रस्त हो गए हैं।
धार्मिक मान्यता है कि माता पार्वती का दांत इस पहाड़ पर गिरा था, जिसके चलते इसे गौरीदंत या गौरी दांत के नाम से जाना जाता है। इसके 108 शक्तिपीठ में से एक माना जाता है। यह पर आज भी कई ऐसी गुफाएं हैं, जिनकी कहानी अनसुलझी है। वहीं यह भी चर्चा है कि पहाड़ों के बीच में इन प्राकृतिक गुफाओं में मार्कण्डेय मुनि ने तपस्या की थी।
Published on:
05 Apr 2026 05:31 pm
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