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सागर. देश में रसगुल्ला और मैसूर पाक जैसी मिठाइयों के "जन्म" की लड़ाई के बीच हमारी चिरौंजी की मिठाई भी किसी से कम नहीं है। शहर का फूड ब्रांड बनी चुकी यह स्वादिष्ट मिठाई सेहत से भी भरपूर है। इसकी मांग शहर की नहीं बल्कि प्रदेशभर में है। इसलिए हमें भी जीआई (जियोग्राफिकल इंडीकेशन) टैग के लिए दावा करना चाहिए। तीन बत्ती स्थित चौधरी मिष्ठान भंडार के संस्थापक चौधरी जमनाप्रसाद तो अब नहीं रहे, लेकिन उनके बेटे हेमचंद्र अपने बेटों-पोतों के साथ इस विरासत को संभाले हुए हैं। उनका दावा है कि 1950 में जब दुकान शुरू हुई थी, तब देश में पहली बार चिरौंजी की मिठाई सागर में ही बनी थी।
प्रदेशभर में मिठाई के जानकार भलीभांति चिरौंजी की इस मिठाई को जानते हैं। बाहर से आने वाले लोग समय मिलने पर इसका स्वाद जरूर चखते हैं। सेहत के लिए फायदेमंद होने के कारण सर्दी में इसकी मांग भी बढ़ जाती है।
इसलिए खास
हेमचंद्र बताते हैं कि उनके पिता ने 67 साल पहले छोटी-सी शुरुआत की थी, जो आज शहर की पहचान बन गई है। यह मिठाई शुद्ध घी व देशी सामग्री से बनाते हैं। इसमें दो प्राकृतिक चीजें शुद्ध देशी घी और शक्कर मिलाई जाती है। इसमें विटामिन्स व प्रोटीन भरपूर मात्रा में होता है। रक्तशोधक व एंटी ऑक्सीडेंट भी है।
1950 में शुरू हुई थी दुकान
04 रुपए से 480 रुपए हुई कीमत
25 दिन तक सुरक्षित रहती है मिठाई
क्या है जीआई टैग
जीआई टैग एक नाम या चिह्न होता है, जो किसी उत्पाद से जुड़ा होता है। यह किसी भौगोलिक क्षेत्र- कस्बा, शहर, इलाका या देश से जुड़ा होता है। विश्व स्वास्थ्य संस्थान (डब्ल्यूटीओ) का सदस्य होने के नाते भारत ने ज्योग्राफिकल इंडिकेशंस ऑफ गुड्स (रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन) एक्ट 1999 को साल 2003 में 15 सितंबर को अपनाया था। भारत में जीआई टैग पाने वाला पहला उत्पाद दार्जलिंग चाय थी। साल 2004-05 में उसे ये कामयाबी मिली थी।
Published on:
28 Nov 2017 11:38 am
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