2 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

मेरी खबर

icon

प्लस

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

जन्मांध होने पर भी सूरदास ने रच दिए ग्रंथ, एेसी है महाकवि की भक्ति की महिमा

महाकवि सूरदासजी की जयंती पर विशेष

2 min read
Google source verification
Great poetl on the birth anniversary of kavi Soordas

Great poetl on the birth anniversary of kavi Soordas

सागर. वैशाख शुक्ल पंचमी शनिवार को महाकवि सूरदासजी की जयंती मनाई जाएगी। भक्ति की धारा में उनका नाम सर्वोपरि लिया जाता है। महाकवि सूरदास को जन्मांध बताया जाता है, लेकिन जो उन्होंने देखा वो कोई न देख पाया। उनका संपूर्ण जीवन श्रीकृष्ण की भक्ति में ही बीता। उन्हें महाकवि की उपाधि प्राप्त हुई। उन्होंने पांच ग्रंथों की रचना की। सूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी, नल दमयंती, ब्याल्हो। इन पांच रचनाओं में से उनकी तीन रचना ही अभी तक प्राप्त हुई हैं। सूरदास जयंती के मौके पर पत्रिका ने शहर के साहित्यकारों से उनकी प्रासंगिकता जानी।
फरीदाबाद में जन्मे
सूरदास एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। इनके पिता रामदास भी गायक थे। कुछ लोग उनका जन्म स्थान गांव सीही को मानते हैं जो हरियाणा के फरीदाबाद जिले में है तो कुछ मथुरा-आगरा मार्ग स्थित रुनकता नामक गांव को उनका जन्म स्थान मानते हैं। उनके जन्मांध होने को लेकर भी विद्वान एकमत नहीं हैं। गुरु वल्लभाचार्य ने उन्हें श्रीकृष्ण की लीलागान का दायित्व सौंपा, जिसे वह जीवन पर्यंत निभाते रहे।
आज भी प्रासंगिक
सूर-सूर तुलसी शषी, उद्गन केशव दास। अब के कवि खदोत सम, जहं-तहं करत प्रकाश।।
यह दोहा उनकी ऊंचाइयों का दर्शाता है। उनके द्वारा लिखा गया भ्रमर गीत वियोग रस का उदाहरण है। भक्ति रस के लिए आज भी वे प्रांसगिक हैं।
डॉ. कुसुम सुरभी,
साहित्यकार
बृज भाषा में साहित्य
कृष्ण ?? भक्ति के लिए सूरदास को जाना जाता है। उनके द्वारा रचित सूरसागर ग्रंथ में एक लाख पद थे, अभी तक ८ हजार पद को पढ़ा गया है। उनका साहित्य बृज भाषा में लिखा गया। वे सच्चे भाव से कृष्ण के उपासक थे, जो उनके साहित्य में दिखाई देता है। उन्होंने देवभक्ति पर साहित्य लिखा और अब लोक की समस्याओं पर साहित्य लिखा जाने लगा है।
पीआर आर मलैया, साहित्यकार
वात्सल्य रस के सम्राट थे
सूरदास को वात्सल्य रस का सम्राट माना जाता है। उन्होंने वात्सल्य रस को आधार बनाकर श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का मनोहारी चित्रण किया। वात्सल्य रस उन्हीं की खोज है। उन्होंने अपने ग्रंथों की रचना बृज भाषा में की। उनका साहित्य आज भी प्रासंगिक है। मथुरा-वृंदावन में जब उनके पदों को भक्त गाते हैं तो ऐसा कोई भक्त नहीं होगा जो मंत्रमुग्ध न हो।
प्रो. सुरेशाचार्य, वरिष्ठ साहित्यकार