10 अप्रैल 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Hindi Divas 2018 : देश को एक सूत्र में बांधकर बढ़ रही हिंदी

हिंदी दिवस पर विशेष: हिंदी की समृद्धि के लिए किया जा रहा लेखन

3 min read
Google source verification

सागर

image

Samved Jain

Sep 14, 2018

hindi

Increasing the country by building a formula in Hindi

सागर. कहा जाता है देश में चार कोस पर वाणी अर्थात भाषा बदल जाती है। इस लिहाज से हिंदी में ही देश को एक सूत्र में बांधे रखने की क्षमता है। हिंदी देश की एकता का मंत्र है। मातृभाषा से शुरू होने वाली हिंदी हमारे सपनों की भाषा है। हिंदी को आज हमने जिस रूप में स्वीकार और प्रचारित किया है। उसके लिए देश-विदेश के संघर्ष और प्रयास किसी से छिपे नहीं हैं। शहर हिंदी की समृद्धि की अद्भुत कहानियां लिखी गईं। हमने कुछ पन्ने पलटाए, कुछ साहित्यकारों को टटोला और पाया कि मातृभाषा से राजभाषा तक के सफर में हिंदी का साथ देने में शहर पीछे रहा। हमारा शहर कवि पदमाकर का शहर है। रीति काल के ब्रजभाषा कवियों में पद्माकर (1753-1833) का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे हिंदी साहित्य के रीतिकालीन कवियों में अंतिम चरण के सुप्रसिद्ध और विशेष सम्मानित कवि थे। पद्माकर राजदरबारी कवि के रूप में कई नरेशों से सम्मानित किए गए थे अत: वे अनेक राजदरबारों में सम्मानपूर्वक रहे। उन्होंने ९ वर्ष की उम्र में लेखन कार्य शुरू कर दिया था। शहर पदमाकर साहित्य समित के द्वारा अनेक आयोजन भी किए गए। आज से ६ दशक पहले कान्ता प्रसाद गुरु ने हिन्दी व्याकरण को लिखा। इसके अलावा कहानीकार जहूर बख्स ने कहानियां लिखी हैं। पं. ज्वालाप्रसाद ज्योतिषी ने निंबध और गद्य लेखन कर अनेकों ग्रंथ यहां से ही लिखे।

हिन्दी विभाग में हुए कई प्रयोग
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी हिन्दी विभाग के पहले विभागअध्यक्ष रहे। ये छायावादी कविता के मान्य आलोचक माने गए हैं। इसके बाद यहां रामरत्न भटनागर, आचार्यधीरज मिश्र, आचार्य प्रेमशंकर और पद्मश्री लक्ष्मीनारयण दुबे जैसे लेखकों ने कार्य किया। इनके सानिध्य में देशभर से विद्यार्थी हिन्दी भाषा की पढ़ाई के लिए यहां पहुंचे। वर्तमान में विवि में 25 छात्र शोधकार्य कर रहे हैं।

वर्तमान में सक्रिय संस्थाएं
श्यामलम, हिन्दी उर्दू मजलिस, बुंदेली पीठ, हिन्दी लेखिका संघ, सरस्वती वाचनालय।

हिंदी सेवी संस्थान
हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार सुरेशाचार्य ने बताया कि वर्ष 1904 में शहर की पहली साहित्य संस्था सरस्वती वाचनालय का गठन हुआ था, उस समय से ही यह संस्था अब अब तक हिन्दी के लिए समर्पित है। यहां संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम में राजर्षि पुरषोत्तम दास टंडन, राधावल्लभ मिश्र, राममूर्ति मिश्र जैसे साहित्यकार आ चुके हैं। विश्वविद्यालय में हिन्दी साहित्य परिषद का पठन 1963 के पास हुआ, जो अब भी कार्यरत है। पदमाकर साहित्य समिति का गठन भी आजादी के बाद किया गया, इस संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कवि महादेवी वर्मा भी यहां आईं, पुलिस एकडेमी में विद्यानिवास मिश्र का व्याख्यान भी हुआ। इसके अलावा विवि द्वारा शहर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन का भी आयोजन किया गया, उस समय राजेन्द्र यादव और कमला प्रसाद ने भी शिरकत की।

मॉरिशस में प्रतिनिधित्व
वैश्विक स्तर पर हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार बढ़ रहा है। हाल ही में 18 से 20 अगस्त तक मॉरिशस में विश्व हिन्दी सम्मेलन हुआ। जिसमें भारत सहित चीन, जापान, रूस, नेपाल, टूबेको और कनेडा से 3 हजार लोगों ने भाग लिया। सम्मेलन में विषय रखा गया था कि वैश्विक हिन्दी और भारतीय संस्कृति। शहर से हिन्दी विभाग के अक्ष्यक्ष आनंद त्रिपाठी और हिन्दी डॉ. छवील मेहर ने भाग लिया। त्रिपाठी ने बताया कि इस सम्मेलन से पता चला हिन्दी कितनी समृद्ध है, यहां के पूर्व प्रधानमंत्री ने भी सम्मेलन में हिन्दी भाषा में ही व्याख्यान दिया। यहां हिन्दीभाषा के लिए लोगों का प्रेम दिखा। त्रिपाठी ने बताया कि भारत से विदेशटक कार जन्मभूमि मंत्री सुषमा स्वराज मौजूद थी। कार्यक्रम के उद्घाटन के बाद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को श्रद्धांजलि भी दी गई।

विवि में शोध
एनई विश्वनाथ अय्यर: हिन्दी मलयालम के आधुनिक काव्य का तुलनात्मक अध्ययन
एनरमन नायर: हिन्दी-मलयालम के भक्तिकालिन काव्य का अध्ययन
सूर्यनारायण मूर्ति: हिंदी-तेलगू के मध्यकालिन, रामसाहित्य का अध्ययन
चंदु लाल जुहे: हिन्दी नाट्य और कन्नड़ नाट्य का अध्ययन
मालती खंडे: हिन्दी और मराठी कवियों का तुलनात्मक अध्ययन

वर्तमान में हो रहे ये शोध -
आशीष कुमार सिंह: शिवमूर्ति का कथा साहित्य
सपन राज: हिन्दी सन्त काव्य, मराठी संतो की रचानाओं का तुलनात्मक अध्ययन
राखी देवी: २१वीं सदी के प्रथम दशक के प्रमुख हिन्दी उपन्याओं में सत्ता विमर्श
नातशा इन्दुस्काया: प्रतिरोध की संस्कृति, स्त्री आत्मकथा पर लेखन
अवधेश कुमार: हिन्दी भक्तिकाल के वैचारिक परिदृश्य
कु. सरिता: २१वीं सदी के हिन्दी उपन्यासों में आदिवासी विमर्श
सौरभ सिंह: हिन्दी नवजागरण
सुधीर साहू: २१वीं शदी की लंबी कहानियों का मूल्यांकन
जुगल किशोर चौधरी: समकालिन हिन्दी गजल में सामाजिक चेतना
रतिराम अहिरवार: बुंदेली समाज की स्थिति