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बुंदेलखंड़ का अनसुना सच: अंधेरा फैलते ही श्मशान में तंत्र साधना, सुबह गायब हो जाते है अघोरी

बुंदेली परंपराओं में आज भी पूर्णिमा और अमावस्या की रात शक्तियों की होती है। इन शक्तियों को जागृत करने में अघोरी बाबाओं द्वारा मरघटों में उपासना की जात

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Know the hidden Secret World of Naga Sadhus of India in hindi

Know the hidden Secret World of Naga Sadhus of India in hindi

सागर. बुंदेली परंपराओं में आज भी पूर्णिमा और अमावस्या की रात शक्तियों की होती है। इन शक्तियों को जागृत करने में अघोरी बाबाओं द्वारा मरघटों में उपासना की जाती है। जिसके नजारे देखना आम इंसान की आत्म शक्ति से बाहर होते ही है। मध्य रात्रि चलने वाली इन तंत्र शक्तियों की खबरें पूरे बुंदेलखंड से आती रही है। सागर, दमोह, टीकमगढ़, छतरपुर और पन्ना में ऐसी शक्तियों को पाकर अच्छे और खराब काम कर रहे बाबाओं का सच भी अनेक बार सामने आ चुका है। अंधेरी रात में श्मशान में साधना और सुबह होते ही गायब हो जाना। ये सब रहस्यमय काम अघोरी बाबा करते हैं। आंखों में ज्वाला और हाथ में चिमटा लिए ये साधु दिखने में जितने डरावने होते हैं, अंदर से उतने ही सहज होते हैं।

न किसी से दोस्ती न किसी से बैर। जब मन किया रुक जाना। जब मन किया चल देना। कभी श्मशान में रात बिताना तो कभी जंगल में सो जाना। कई-कई दिनों तक बगैर भोजन के रहना। बड़ी-बड़ी जटाएं रखना। अंधेरी रात में श्मशान में साधना और सुबह होते ही गायब हो जाना। ये सब रहस्यमय काम अघोरी बाबा करते हैं। आंखों में ज्वाला और हाथ में चिमटा लिए ये साधु दिखने में जितने डरावने होते हैं, अंदर से उतने ही सहज होते हैं। तो आइए आज आपको रूबरू कराते हैं नागाओं की रहस्मयी हकीकत से...

अघोरी अघोर पंथ को मानने वाले अघोरी कहलाते हैं। अघोर पंथ की उत्पत्ति के बारे में निश्चित प्रमाण नहीं मिले हैं, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि ये कपालिक संप्रदाय के समकक्ष होते हैं। ये देश के पुरातन धर्म शैव (शिव साधक) से संबंध रखते हैं। अघोरियों को इस पृथ्वी पर भगवान शिव ? का जीवित रूप भी माना जाता है। शिवजी के पांच रूपों में से एक रूप अघोर रूप है। अघोरियों की साधना विधि ज्यादा रहस्यमयी है। उनकी अपनी शैली, अपना विधान है।

जा सकते हैं किसी भी हद तक

अघोरियों के बारे में कई बातें प्रसिद्ध हैं जैसे कि वे बहुत ही हठी होते हैं, अगर किसी बात पर अड़ जाएं तो उसे पूरा किए बगैर नहीं छोड़ते। गुस्सा हो जाएं तो किसी भी हद तक जा सकते हैं। अधिकतर अघोरियों की आंखें लाल होती हैं, जैसे वो बहुत गुस्सा हो, लेकिन उनका मन उतना ही शांत भी होता है। काले वस्त्रों में लिपटे अघोरी गले में नरमुंड की माला पहनते हैं। वे अक्सर श्मशानों में ही अपनी कुटिया बनाते हैं। जहां एक छोटी सी धुनी जलती रहती है।

कुछ भी खा लेते हैं अघोरी

अघोरियों के लिए साधना के पूर्व मोह-माया का त्याग जरूरी है। मूलत: अघोरी उसे कहते हैं जिसके भीतर से अच्छे-बुरे, सुगंध-दुर्गंध, प्रेम-नफरत, ईष्र्या-मोह जैसे सारे भाव मिट जाएं। सभी तरह के वैराग्य को प्राप्त करने के लिए ये साधु श्मशान में कुछ दिन गुजारने के बाद पुन: हिमालय या जंगल में चले जाते हैं। अघोरी खाने-पीने में किसी तरह का कोई परहेज नहीं नहीं करता। रोटी मिले तो रोटी खा लें, खीर मिले खीर खा लें, बकरा मिले तो बकरा और मानव शव मिले तो उससे भी परहेज नहीं। यह तो ठीक है अघोरी सड़ते पशु का मांस भी बिना किसी हिचकिचाहट के खा लेता है।

तीन साधना करते हैं अघोरी

शिव साधना, शव साधना और श्मशान साधना, तीन प्रकार की साधनाएं करते हैं अघोरी। शिव साधना में शव के ऊपर पैर रखकर खड़े रहकर साधना की जाती है। बाकी तरीके शव साधना की ही तरह होते हैं। ऐसी साधनाओं में मुर्दे को प्रसाद के रूप में मांस और मदिरा चढ़ाई जाती है। तीसरी श्मशान साधना होती है। जिसमें आम परिवारजनों को भी शामिल किया जा सकता है।

मुर्दे से कर सकते हैं बात

हिन्दू धर्म में आज भी किसी 5 साल से कम उम्र के बच्चे, सांप काटने से मरे हुए लोगों, आत्महत्या किए लोगों का शव जलाया नहीं जाता बल्कि दफनाया या बहती नदी में प्रवाहित कर कर दिया जाता है। पानी में प्रवाहित ये शव डूबने के बाद हल्के होकर पानी में तैरने लगते हैं। अक्सर अघोरी तांत्रिक इन्हीं शवों को पानी से ढूंढ़कर निकालते और अपनी तंत्र सिद्धि के लिए प्रयोग करते हैं। इनकी साधना में इतना बल होता है कि वे मुर्दे से भी बात कर सकते।