
Number of children falling continuously in government schools
सागर. शिक्षा का अधिकार अधिनियम यानी आरटीई के तहत जिले में पिछले 6 सालों में शिक्षा विभाग ने सरकारी खर्चे पर २० हजार बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने के लिए 9 करोड़ ९६ लाख से ज्यादा की राशि खर्च की है। पर सरकारी खर्चे से प्राइवेट स्कूलों में छात्रों को प्रवेश दिलाने की सरकारी नीति खुद विभाग के अपने ही सरकारी स्कूलों पर भारी पड़ रही है। पिछले ६ सालों में हर साल सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या घटी है। यहां पर्याप्त संसाधन न होने की वजह से अब अभिभावक बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाना चाह रहे हैं। शुद्ध पेयजल का अभाव, शौचालयों की कमी, मिड-डे मील में खामियां, खस्ताहाल इमारत व फर्नीचर आदि कई प्रकार की असुविधाएं सरकारी स्कूलों से विद्यार्थियों को दूर कर रही हैं। यही वजह है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षकों को बिना पढ़ाए ही वेतन दिया जा रहा है। जिले के लगभग १०० स्कूल ऐसे हैं जहां विद्यार्थियों की संख्या केवल १० से २० है और शिक्षक की संख्या ज्यादा है।
आरटीइ के तहत निजी स्कूलों में खर्च
२०११-२०१२ ५३ लाख ९६ हजार ४९०
२०१२-२०१३ ३५ लाख ३८ हजार २६८
२०१३-२०१४ २ करोड़ ४१ लाख ९ हजार १७५
२०१४-२०१५ १ करोड़ ८५ लाख ८६ हजार ४३२
२०१५-२०१६ ४ करोड़ ७९ लाख ७२ हजार २२४
गांवों में भी रुचि नहीं
ग्रामीण क्षेत्रों में भी अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में प्रवेश दिलाने की बजाय निजी स्कूलों में दाखिला कराने में रुचि ले रहे हैं। जिससे सरकारी स्कूलों में प्रवेश दर कम होने से सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को अब प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर अपने स्कूलों की मार्केटिंग करनी पड़ रही है। घर-घर जाकर शिक्षक सर्व शिक्षा अभियान में जुट गए हैं लेकिन बच्चे नहीं बढ़ रहे हैं।
हर माह तीन लाख
शासन द्वारा ३० बच्चों की संख्या पर प्राथमिक शाला में एक शिक्षक की नियुक्ति की गई है, लेकिन स्थिति उलट है। स्कूल शिक्षा विभाग शिक्षकों को मुफ्त का वेतन बांट रहा है, क्योंकि स्कूलों में बच्चे नहीं है। जानकारी के अनुसार हर स्कूल में शिक्षकों को लगभग ३ लाख रुपए का वेतन मिलता है।
Published on:
07 Jun 2018 08:40 pm
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