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सोयाबीन की फसल बन रही घाटे का सौदा, किसान कर रहे दाम बढ़ाने की मांग, लागत आ रही ज्यादा

छह हजार रुपए क्विंटल दाम करने की मांग, जिससे निकल सके लागत और न हो आर्थिक क्षति

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Soybean crop is becoming a loss making deal

सोयाबीन फसल

बीना. पिछले कई वर्षों से सोयाबीन के दामों में इजाफा न होने से किसानों को घाटा हो रहा है, जिससे इस बार किसानों ने फसल आने के पहले ही दाम बढ़ाने की मांग शुरू कर दी है।
इस वर्ष 41 हजार 660 हेक्टेयर में सोयाबीन की बोवनी की गई है और अभी दाम चार हजार रुपए क्विंटल के आसपास हैं, जबकि आवक भी कम है। आवक के समय यह दाम चार हजार रुपए क्विंटल के नीचे तक पहुंच जाते हैं। कम दामों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है और अभी से वह दाम बढ़ाने की मांग करने लगे हैं। क्योंकि इतने कम दामों में लागत भी निकलना मुश्किल हो रही है। किसान छह हजार रुपए क्विंटल दाम देने की मांग कर रहे हैं। किसान रविन्द्र तिवारी ने बताया कि पिछले कई वर्षों से सोयाबीन के दामों में उछाल नहीं आया है, जिससे किसानों को घाटा हो रहा है, जो किसान ठेके पर जमीन लिए हैं उन्हें ज्यादा घाटा हो रहा है। जल्द से जल्द सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए। किसान रामजी राय ने बताया कि सोयाबीन का एमएसपी बढ़ाकर उसके अनुसार ही खरीदी करनी चाहिए, जिससे किसानों को घाटा न हो।

एक एकड़ में लागत और उत्पादन
एक एकड़ में दो बार जुताई, बोवनी, बीज, खाद, खरपतबार नाशक दवा, कीट नाशक दवा, फसल कटाई, थ्रेसर, मजदूरी, मंडी खर्च मिलाकर कुल लागत 18 हजार 300 रुपए आती है। औसत पैदावार एक एकड़ में करीब चार क्विंटल है, जिसकी कीमत आज के बाजार रेट के अनुसार सोलह हजार रुपए है। कई बार कीटों के प्रकोप होने से औसत पैदावार से भी कम उत्पादन होता है।

डीओसी का नहीं हो रहा निर्यात
व्यापारियों के अनुसार पहले सोयाबीन की डीओसी (खली) का निर्यात होता था, लेकिन अब इसपर रोक लगी है। साथ ही सोयाबीन से बने प्रोडक्टों का आयात भी हो रहा है, जिससे दामों में ज्यादा उछाल नहीं आ रहा है।