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आज से नहीं, मराठा काल से UP में भी है बागेश्वर धाम, क्या आप जानते हैं?

आप MP के छत्तरपुर स्थित बागेश्वर धाम को जानते होंगे, लेकिन UP के सहारनपुर में भी मराठा काल से बागेश्वर धाम है।

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सहारनपुर के कंपनी बाग में स्थित बागेश्वर धाम

अभी तक आप एक ही बागेश्वर धाम को जानते होंगे, जिनके सेवक धीरेंद्र शास्त्री हैं। आज हम आपको यूपी के सहारनपुर लेकर चलते हैं, जहां मराठा काल से बागेश्वर धाम विराजमान हैं। इस बागेश्वर धाम में पंचमुखी महादेव के दर्शन होते हैं। यहां पंचमुखी भगवान के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। सहारनपुर के इस बागेश्वर धाम का अपना अलग इतिहास भी है।


शुद्ध धातु से निर्मित है पंचमुखी स्वरूप
देश की राजधानी दिल्ली से उत्तर दिशा में 170 किलोमीटर चलने के बाद यूपी का अंतिम जिला सहारनपुर आता है। इसकी सीमाएं हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और उत्तराखंड राज्य से लगती हैं। इस शहर को काष्ठ नगरी भी कहा जाता है। इसी सहारनपुर शहर के बीचो-बीच बागेश्वर धाम स्थित है, जहां शुद्ध धातु से बने पंचमुखी महादेव का स्वरूप विराजमान है। यह अलग बात है कि इस भवन के गेट पर अब 'बागेश्वर महादेव मंदिर' लिखा है। लेकिन भक्त दशकों से इस मंदिर को बागेश्वर धाम के नाम से ही जानते और पुकारते आ रहे हैं।

शास्त्रों में भी है पंचमुखी स्वरूप का उल्लेख
शास्त्रों में पांच शिवलिंग का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि उनमें से एक बागेश्वर शिवलिंग सहारनपुर में स्थित है। ऐसी मान्यता है कि यहां जमीन से शिवलिंग प्रकट हुए थे। किताबों में भी सहारनपुर के कंपनी बाग में बागेश्वर शिवलिंग के जमीन के अंदर से प्रकट होने की कथाओं का उल्लेख किया गया है। सहारनपुर में बागेश्वर धाम की स्थापना अंग्रेजी शासनकाल में हुई। इससे पहले यह स्थान मराठाें के कब्जे में था।

जमीन से प्रकट हुए थे यहां पर शिवलिंग
जहां पर आज बागेश्वर धाम हैं, वहां पहले जंगल हुआ करता था। धाम के पुजारी बताते हैं कि यह क्षेत्र सहारनपुर का कंपनी बाग कहलाता था और जंगल था। इस स्थान पर महात्माओं का डेरा रहता था। एक बार एक महात्मा जब विचरण कर रहे थे तो उनके पैर में ठोकर लगी। तब उन्होंने देखा कि जमीन के अंदर से शिवलिंग जैसा आकार बाहर आ रहा था। तब एक अंग्रेजी अधिकारी ने बताया कि इस स्थान से रात में शेरों के दहाड़ने की आवाज सुनाई देती थी। बाद में इसी शिवलिंग को बागेश्वर शिवलिंग की मान्यता मिली।

अंग्रेजों ने भी की पुष्टि
धाम के पुजारी आचार्य रामप्रसाद वशिष्ठ बताते हैं कि, पहले महात्मा की बात पर किसी ने विश्वास नहीं किया। बाद में अंग्रेज अफसर ने बताया कि रात में इस स्थान से शेरों के दहाड़ने की आवज आती थी। इससे सैनिक अलर्ट हो जाते थे। यह जानने के बाद एक गोरखा यानी पहाड़ी कर्मचारी ने यहां छोटे से मंदिर की स्थापना कर दी।


इसके बाद से रात में शेरों के दहाड़ने की आवाज आना बंद हो गई। अंग्रेज अफसर ने अपनी किताब में ये भी लिखा कि जब सैनिक रात को एक बार दहाड़ने की आवाज की दिशा में भेजे गए तो वहां एक जटाधारी योगी बाबा ध्यान लगाए हुए नजर आए। सैनिकों ने बताया कि उनके पास एक बच्चा भी देखा गया। ऐसे में मान्यता यह बन गई भगवान शिव यहां ध्यान लगाने आते थे।