
संभल में सरकारी जमीन पर मकान..
Land Encroachment Sambhal: संभल जिले में सरकारी भूमि पर कथित अवैध कब्जे को लेकर एक बड़ा मामला सामने आया है, जिसमें अब जिलाधिकारी न्यायालय में अपील दायर की गई है। इस मामले की सुनवाई आगामी 10 अप्रैल को तय की गई है। इससे पहले तहसीलदार न्यायालय ने दो बीघा भूमि को सरकारी घोषित करते हुए कब्जा हटाने और करीब 7 करोड़ रुपये का भारी जुर्माना लगाने का आदेश दिया था। इस फैसले के खिलाफ अब संबंधित पक्ष ने उच्च स्तर पर न्याय की मांग की है।
यह पूरा मामला संभल जनपद के पंवासा ब्लॉक के सैफ खां सराय गांव का है। तहसीलदार न्यायालय ने 9 मार्च को गाटा संख्या 452 की 0.1340 हेक्टेयर (करीब दो बीघा) जमीन को सरकारी संपत्ति घोषित किया था। आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि इस भूमि पर किया गया कब्जा अवैध है और उसे तत्काल हटाकर जमीन को खाली कराया जाए। साथ ही कब्जाधारियों पर आर्थिक दंड भी लगाया गया, जिससे विवाद और गहरा गया।
मामले में पैरवी कर रहे अधिवक्ता माधव मिश्रा के अनुसार तहसीलदार के आदेश को चुनौती देते हुए जिलाधिकारी न्यायालय में अपील दायर की गई है। उन्होंने बताया कि उनके मुवक्किल को अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार है और इसी प्रक्रिया के तहत अब डीएम कोर्ट में सुनवाई होगी। यह मामला अब प्रशासनिक और कानूनी दोनों स्तरों पर अहम बन गया है।
लेखपाल राहुल धारीवाल की रिपोर्ट के अनुसार, आफताब हुसैन वारसी और उनके भाई मेहताब हुसैन पर इस सरकारी भूमि पर कब्जा करने का आरोप है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि विवादित जमीन की अनुमानित कीमत करीब 6 करोड़ 94 लाख 19 हजार रुपये है। इतने बड़े मूल्य की जमीन पर कब्जे के आरोपों ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है।
प्रशासन की ओर से यह दावा किया गया है कि आरोपियों ने इस भूमि पर पक्का मकान, मस्जिद और दरगाह का निर्माण कर लिया है। लेखपाल द्वारा 24 जून 2025 को इस संबंध में रिपोर्ट दी गई थी, जिसके आधार पर ग्राम सभा बनाम आफताब हुसैन के नाम से वाद दर्ज हुआ और नोटिस जारी किए गए। यह मामला धार्मिक और सामाजिक संवेदनशीलता से भी जुड़ गया है, जिससे इसकी गंभीरता और बढ़ गई है।
प्रतिवादी पक्ष ने इस मामले में पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया था, लेकिन वहां से उन्हें कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद तहसीलदार न्यायालय ने आदेश जारी करते हुए अपील के लिए समय दिया था। अब उसी के तहत डीएम कोर्ट में अपील दाखिल की गई है, जिससे मामले ने नया कानूनी मोड़ ले लिया है।
इस पूरे प्रकरण में 30 जून को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था, जिसके बाद 18 जुलाई को प्रतिवादी पक्ष ने अपना जवाब दाखिल किया। 7 मार्च 2026 को इस मामले में बहस भी हुई। प्रतिवादी पक्ष का कहना है कि उन्हें 15 जून 1972 में भी बेदखली का नोटिस मिला था, जिसे बाद में प्रशासन ने वापस ले लिया था। उनका दावा है कि वर्तमान में दी गई रिपोर्ट भ्रामक है और निर्माण को गलत तरीके से हाल का बताया गया है।
आरोपी पक्ष का यह भी कहना है कि संबंधित भूमि वक्फ संख्या 3037 के तहत पहले से ही वक्फ एक्ट 1995 के अंतर्गत उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में दर्ज है। ऐसे में यह विवाद अब केवल जमीन के कब्जे का नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार और धार्मिक संपत्ति के दावे का भी बन गया है। 10 अप्रैल को होने वाली सुनवाई इस पूरे मामले की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
Published on:
28 Mar 2026 08:14 pm
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