
12 benefits of surya namaskar in hindi
सतना।सूर्य नमस्कार सभी योगासनों में सर्वश्रेष्ठ है। इस आसन को सुबह सूर्य के सामने करने चाहिए। जिससे हमे विटामिन डी मिलता है। इसके नियमित अभ्यास से मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है। वजन और मोटापा घटाने में भी बेहद लाभकारी है। इसके अभ्यास से साधक का शरीर निरोगी और स्वस्थ रहता है। इस आसन को बच्चों से लेकर बड़ों तक, स्त्री हो या पुरुष कोई भी कर सकता है।
1. पहला अभ्यास:
प्रार्थना की मुद्रा: प्रार्थना की मुद्रा में दोनों हाथों को जोड़कर कोहनियों से जमीन के समानांतर पंजों को मिलाकर सीधे खड़े हों। पूरे शरीर को शिथिल छोड़ दीजिए।
लाभ- एकाग्रता व चित्त शांत होने के साथ रक्तसंचार सामान्य होता है।
2. दूसरा अभ्यास:
हस्त उत्तानासन: दोनों भुजाओं को सिर के ऊपर उठाएं। कानों से स्पर्श करते हुए भुजाएं, सिर और ऊपरी धड़ को यथाशक्ति पीछे झुकाएं।
लाभ: उदर की अतिरिक्त चर्बी को हटाने के साथ पाचन क्रिया को सुधारता है। फेफड़े पुष्ट होते हैं। भुजाओं और कंधों की मांसपेशियों का व्यायाम होता है।
3. तीसरा अभ्यास:
पादहस्तासन: सामने की ओर तब तक झुकते जाएं जब तक कि हाथ की अंगुलियां जमीन को पैरों के बगल में स्पर्श न कर लें। मस्तक को घुटने से स्पर्श कराएं। पैरों को सीधा रखें।
लाभ: पेट व आमाशय के दोष नष्ट होते हैं। पेट की चर्बी व कब्ज को दूर करता है।
4. चौथा अभ्यास:
अश्व संचालनासन: बाएं पैर को पीछे फैलाएं। बाएं घुटने को भूमि पर टिकाते हुए पैर के पिछले भाग को भूमि से स्पर्श कराएं। दाएं पैर को घुटने से मोडि़ए व दाएं जंघे को पिंडलियों से सटाते हुए पंजे को अपने स्थान पर रखें। भुजाएं अपने स्थान पर सीधा रखें। हाथों के पंजे व दाएं पैर का पंजा एक सरल रेखा में हो। शरीर का भार दोनों हाथों व दाएं पैर के ऊपर रहेगा। अंतिम स्थिति में सिर को पीछे उठाएं। कमर को धनुषाकार बनाइए और दृष्टि ऊपर की तरफ रखें।
लाभ: उदर के अंगों की मालिश कर उसकी कार्य प्रणाली को सुधारता है। पैरों की मांसपेशियों को शक्ति ? देता है।
5. पांचवां अभ्यास:
पर्वतासन: दोनों पैरों के तलवे जमीन पर स्थापित करते हुए कमर व नितंबों को अधिकतम ऊपर उठाएं। एडिय़ां जमीन से सटी रहें। दृष्टि नाभि पर रखें।
लाभ: भुजाओं एवं पैरों के स्नायु व मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करता है। रीढ़ को लचीला व स्नायु के दबाव को सामान्य बनाता है। इससे शुद्ध रक्त का संचार होता है। रक्त का प्रवाह मस्तिष्क को क्रियाशील बनाता है।
6. छठवां अभ्यास:
अष्टांग नमस्कार: घुटनों को जमीन पर टिकाएं। पंजों को पलटाएं व तलवों को आकाश की ओर करें। शरीर को भूमि पर इस प्रकार झुकाएं कि अंतिम स्थिति में दोनों पैरों के पंजे, दोनों घुटने, सीना, दोनों हाथ व ठुड्डी भूमि का स्पर्श करे। नितंब व उदर जमीन से थोड़े ऊपर उठे रहें।
लाभ: पैरों और भुजाओं की मांसपेशियों को शक्ति मिलती है। सीना विकसित होता है।
7. सातवां अभ्यास:
भुजंगासन: हाथों को सीधा करते हुए कमर से ऊपर के भाग को ऊपर की ओर उठाएं। सिर व गर्दन को पीछे की ओर झुकाएं। दृष्टि आसमान की तरफ रहे।
लाभ: यह आमाशय के अंगों में जमे हुए रक्त को हटाकर संचार को व्यवस्थित करता है। बदहजमी व कब्ज जैसे पेट के अन्य रोगों से मुक्ति दिलाता है।
8. आठवां अभ्यास:
पर्वतासन: यह अभ्यास पांचवें अभ्यास की पुरावृत्ति है। लाभ भी उसी प्रकार है।
9. नवमां अभ्यास:
अश्व संचालनासन: यह अभ्यास चार की स्थिति के समान है। पूर्व के अभ्यास में बाएं पैर को पीछे ले जाना होता है, जबकि इस अभ्यास में दाएं पैर को पीछे ले जाया जाता है। बाएं पैर आगे दोनों हाथों के बीच में आता है।
लाभ: उदर के अंगों की मालिश कर उसकी कार्य प्रणाली को सुधारता है। इस क्रिया से पैरों की मांसपेशियों को शक्ति मिलती है।
10. दसवां अभ्यास:
पादहस्तासन: दाहिने पैर के पंजे को बाएं पैर के पंजे के पास स्थापित करें। पैरों को सीधा रखें व माथे को घुटने से स्पर्श कराने का प्रयास करें। दोनों पैरों के पंजे व हाथों के पंजों को एक सीध में रखें।
लाभ: पेट व आमाशय के दोष को नष्ट करता है। उदर की चर्बी व कब्ज को हटाने में सहायक होता है।
11. ग्यारहवां अभ्यास:
हस्त उत्तानासन: यह अभ्यास दूसरे अभ्यास की पुनरावृत्ति है।
12. बारहवां अभ्यास:
प्रार्थना मुद्रा: यह अभ्यास पहले अभ्यास की पुनरावृत्ति है।
Published on:
11 Jan 2018 06:49 pm
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