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बारिश में हरा रहता है ये घाट, यहां दिखेगा 130 मिलियन वर्ष पुराना पर्पल फ्रॉग

निशाचर प्राइमेट, भालू, बाघ और पर्पल फ्रॉग सहित कई जानवरों के बारे में जानने का उत्साह यहां समाप्त होगा।

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Abha Sen

Oct 29, 2015

  asian elephant

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सतना। बारिश के कारण हरा-भरा रहने वाला पश्चिमी घाट या सहयाद्रि, विविध प्रकार के जीव-जन्तुओं का घर है। निशाचर प्राइमेट, भालू, बाघ और पर्पल फ्रॉग सहित कई जानवरों के बारे में जानने का उत्साह यहां समाप्त होगा। डिस्कवरी चैनल पर सोमवार रात नौ बजे इंडिया रिवील्ड कार्यक्रम प्रसारित किया जाएगा, जिसमें भारत के अनोखे वन्यजीवन के बारे में दिलचस्प जानकारियां देखने को मिलेंगी। खासकर बारिश के बाद के वन्यजीवन पर ध्यान केन्द्रित किया जाएगा।
जल बहुत जरूरी

इन घाटों में रहने वाले जीवों के एक विशिष्ट समूह उभयचर के लिए जल बहुत जरूरी होता है। वैज्ञानिकों को यहां हमेशा नए-नए उभयचर मिलते रहते हैं। मेंढकों की करीब 138 प्रजातियां यहां मौजूद हैं। डीएनए सबूत से पता चला है कि पर्पल फ्रॉग 130 मिलियन वर्ष पुराना डायनासौर काल का जीव है। यह मेंढक साल का ज्यादातर समय भूमिगत रहकर बिताता है और मानसून के दौरान सिर्फ दो सप्ताह के लिए ही सतह पर आता है वह भी संभोग के लिए।
एशियाई हाथी

पश्चिमी घाट दुनिया में एशियाई हाथी की सबसे बड़ी आबादी में से एक है। जंगल में बंदरों की भी बड़ी आबादी है। दुनिया की सबसे बड़ी बिल्ली इन्हीं जंगलों में घूमती है। विश्व में जीवित कुल बाघ की लगभग 10 फ ीसदी आबादी पश्चिमी घाटों में ही रहती है। इन पहाड़ी घाटों में वन्य गलियारे विकसित हो गए हैं, जो भारत के पश्चिमी तटीय इलाके से लेकर श्रीलंका तक फैले हुए हैं। भूतकाल में जब समुद्र का जल स्तर नीचे होता था, तब कई जानवर यहां से सीधे श्रीलंका पहुंच जाते थे, जो कई बार पश्चिमी घाट का विस्तार ही लगता था।
बाघों को मिलती सुरक्षा

बाघ अपने क्षेत्र की सुरक्षा के लिए साल भर इन्हीं घाटों में रहते हैं। इन घाटों में जीवित रहने के लिए उन्हें शिकार की जरूरत होती है और स्वच्छ पेयजल की भी। बाघ, बिल्ली प्रजाति के कुछ चुनिंदा जीव हैं, जिन्हें पानी पसंद होता है। मानसूनी जंगल बाघों के लिए आदर्श प्रवास होते हैं और इसीलिए पश्चिमी घाट को भारत में बाघों के लिए सबसे बेहतरीन जगह बनाती है। इस वर्षा जंगल में पौधों की 5000 विभिन्न प्रजातियां उपलब्ध हैं।
यहीं से आए हॉर्नबिल

वैज्ञानिक सबूत दर्शाते हैं कि भारत के एशिया से जुडऩे से पहले हॉर्नबिल शायद यहीं से ही आए थे। कई वर्ष पहले दो महान द्वीप दक्षिण में गोंडवाना और उत्तर में लॉरेशिया हुआ करते थे। जब 165 मिलियन वर्ष पहले गोंडवाना का विखंडित हुआ तो भारत भूमध्य रेखा के पार चला गया। 50 मिलियन वर्ष पहले यह लॉरेशिया के इतने करीब पहुंच चुका था कि हॉर्नबिल के लिए यहां पहुंचना बहुत आसान हो गया था। जब 45 मिलियन वर्ष पहले ये द्वीप जुड़े तो इससे भूमि पर रहने वाले नए जीवों के लिए यहां आने का रास्ता खुल गया।

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