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जिंदगी के उपवन में आप गुल खिला देना

गीतम रचना संस्कृति विचार मंच द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन में कवियों ने बांधा समां

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सतना

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Jyoti Gupta

Apr 11, 2019

akhil bharteey kavi sammelan

akhil bharteey kavi sammelan

सतना. गीत प्रीत के जब लिखे आप मुस्करा देना, जिंदगी के उपवन में आप गुल खिला देना...इसी से गीत गाकर गीतकार दीपक गौतम ने अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का शुभारंभ किया। इसके बाद विंध्य और राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर के गीतकार, साहित्यकार, गजलकारों और व्यंग्यकारों ने एक से बढ़कर एक मुक्तक, शेर, गीत, गजलों को पढ़कर वो समां बांधा कि दर्शक और श्रोता एक टक उनको सुनते ही रह गए। बुधवार को गीतम रचना संस्कृति विचार मंच द्वारा गीतार्षि प्रो. सुमेर सिंह शैलेश की जयंती पर साहित्यकार दिवस मनाया गया। पहले सत्र में प्रसिद्ध गीतकार डॉ. राजेंद्र राजन को विश्वविख्यात गीतकार स्वा. सुमेर सिंह शैलेश अलंकृत से सम्मानित किया गया। इसका शुभारंभ पं. विनोद मिश्र के सांस्कृतिक मंगलाचरण से हुआ। मुख्य अतिथि पूणेंद्र कुमार सिंह और अध्यक्षता प्रो. प्रहलाद अग्रवाल ने की। मंच संचालन जितेंद्र कुमार सिंह संजय द्वारा किया गया। विशिष्ट अतिथि पद्मश्री बाबूलाल दाहिया, गीतेंद्र प्रताप सिंह, रामनरेश, चंद्रिका प्रसाद, सुदामा शरद मौजूद रहे। दूसरे सत्र में अखिलभारतीय कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ। फिर बारी आई काव्य पाठों । एेसी काव्य रचनाएं कवियों द्वारा पढ़ी कवि कि लगातार तालियों से उनका स्वागत देर रात लोगों द्वारा किया गया। व्यंग्यकार रवि शंकर चतुर्वेदी ने बे सुरे से अलाप होने दो, झूठ के मंत्र जाप होने दो, मातु गंगा जरूर आऊंगी , थोड़ा और पाप होने दो ओज रचना को सुना कर खूब वाह-वाही बटोरी। इसके बाद कवि शैलेंद्र सिंह ने कष्ट में अब न कोई बंदा रहे, कैद में न कोई परिंदा रहे मुक्तक सुना कर सभी को आनंदित किया। रमेश सिंह जाखी ने दुऊ काउडी का पाकिस्तान, डेली खुआ करें बेइमान बघेली रचना सुना कर जोश में भर दिया। भोपाल से आई अंतरराष्ट्रीय गीतकार अनूसपन ने अपनी समस्त रचनाओं को स्वा. सुमेर सिंह शैलेश को समर्पित किया। कभी मुक्तक, कभी गजल और कभी एक से बढ़कर शेर को प्रस्तुत कर आश्चर्यचकित कर दिया। उनकी द्वारा लिखित मुक्तक धूप के आईने में संवर जायोगे, जिंदगी जब तपेगी निखर जायोगे जब सुनाया तो सभी ने जमकर तालियां बजाकर हौसलाफजाइ की। उर्मला सिंह ने है तमन्ना मेरी हम सफर तुम बनो सुनाया। डॉ. कृष्णकांत त्रिपाठी राही ने मंच संचालन कर सत्य दुबका है सहम कर पोथियों को रचना को सुनाया। साहित्यकार बाबूलाल दाहिया ने कौन तरक्की का खुला राम दही कै द्वार, डॉ. नरेश कात्यायन ने जिंदगी क्या है फकट इतना सा फंसाना है का पाठ किया। अंत में ख्यातिलब्ध गीतकार डॉ. राजेंद्र राजन ने मंच को संभाला। उनकी गीत और मुक्तकों में लोग एेसे गुम हुए कि कब देर रात हो गई पता ही न चला। रिश्ते सहना भी जिम्मेदारी है, चाहे जितनी भी जंग जारी है, कितनी नाजुक घड़ी की सुइयां हैं और ये वक्त कितना भारी है गीत को सुनाकर कवि सम्मेलन का समापन किया।