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बड़ी दिलचस्प है आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बंका बैगा की कहानी

सीधी जिले के आदिवासी बांकेलाल बैगा ने समाज के लिए कई बड़े आंदोलन

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freedom fighter of Sidhi

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सीधी। जिला मुख्यालय के समीपी ग्राम बोदरहा में एक गरीब आदिवासी परिवार में जन्मे बांकेलाल बैगा (बंका बैगा) इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुके हैं। जिले के एकमात्र आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बंका बैगा ने न सिर्फ स्वतंत्रता की लड़ाई में सहभागिता निभाई, बल्कि समाज और गरीब तबके लिए पवाईदार, जमीदारों के विरुद्ध भी कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। शहर के इतिहासविद बताते हैं कि गोवा आंदोलन में भाग लेने के दौरान पुर्तगालियों से संघर्ष में बंका के रीढ़ की हड्डी टूट गई थी। पैर की जांघ में गोली भी लगी थी, लेकिन वे इस संघर्ष में जीवित बच गए थे। आंदोलन समाप्त होने के करीब तीन माह बाद जिलेवासियों को रेडियो के माध्यम से उनके जीवित होने की सूचना मिली थी। गोवा से वह पैदल यात्रा करते हुए करीब चार माह में सीधी पहुंचे थे।

यह पूरी कहानी
इतिहासकारों की मानें तो गोवा को पुर्तगालियों से मुक्त कराने के लिए 1960 में हुए आंदोलन में जिले से एक जत्था गया था। इसमें सीधी से चंद्रप्रताप तिवारी, बांकेलाल उर्फ बंका बैगा, रामभजन बैगा, नीलकंठ तिवारी तथा रीवा से जमुना प्रसाद शास्त्री व जगदीश चंद्र जोशी गए थे। जब आंदोलन शुरू हुआ और पुर्तगाली गोली चलाने लगे तो आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं ने सभी से जमीन पर लेटने के लिए कहा। सभी लेट गए पर बंका बैगा समझ नहीं पाए। इससे खड़े ही रह गए। उसी दौरान उनके जंघा में गोली के छर्रे लग गए और भाग नहीं पाए। पुर्तगालियों ने उन्हें खूब मारा, जिससे रीढ़ की हड्डी टूट गई थी। बंका बैगा के बाल बड़े थे, इसलिए किसी पुर्तगाली ने कहा कि लगता है साधू है और फिर एक गड्ढेे में कीचड़ में ही छोड़कर चले गए। इसके बाद भारतीय सैनिकों ने उपचार कराया। जब ठीक हो गए तो गोवा से पैदल ही चल दिए। कुछ दिन चलते फिर कहीं मजदूरी करते। फिर चलते। ऐसा करते 4 महीने में घर पहुंचे थे।

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IMAGE CREDIT: Patrika

महुआ और कुठिला आंदोलन रहे खास
बंका बैगा एक क्रांतिकारी आदिवासी नेता थे। उन्होंने गरीब वर्ग व समाज के लिए कई आंदोलन का नेतृत्व किया। 1951 में महुआ आंदोलन किया था। बताते हैं कि महुआ आदिवासी की प्रमुख खाद्य सामग्री थी, जिसे वह जंगल से बीनते थे, लेकिन महुआ का आधा हिस्सा पवाईदार ले लिया करते थे। इसके विरोध में उन्होंने यह आंदोलन किया था। 1966 में अकाल पड़ा तो गरीब भूख से मर रहे थे। तब उनके द्वारा कुठिला फोड़ आंदोलन शुरू किया गया। इसमें बंका बैगा अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ पवाईदारों के घरों में घुसते थे और उनके यहां अनाज रखने का मिट्टी का बना कुठिला फोडकऱ आवश्यकता के अनुरूप अनाज उठा ले जाते थे। इस आंदोलन के कारण उन्हें जेल यात्रा भी करनी पड़ी थी। 1985 में बांध फोड़ आंदोलन भी किया था। इसमें में उन्होंने बांध निर्माण का विरोध किया था।

सरपंच से लेकर विधानसभा तक का लड़ा था चुनाव
पंचायती राज का गठन हुआ और सरपंचों का चुनाव शुरू हुआ तो बंका बैगा ने सरपंच का चुनाव लड़ा। इसमें वे निर्वाचित हुए। वर्ष 1972-73 में गोपद बनास विधानसभा से चुनाव लड़ा था, जिसमें पराजय का सामना करना पड़ा था।

सामाजिक योगदान भी कम नहीं
वर्ष 1952 में खोह गांव का नाम बदलकर गांधीग्राम रखा। गांधीग्राम में कस्तूरबा बाई आदिवासी कन्या आश्रम की स्थापना कराई। वर्ष 1958 में सामूहिक कृषि समिति का गठन कराया। इसके अंतर्गत लगभग 58 एकड़ जमीन और 60 पेड़ महुआ का पेड़ आज भी है। भू-बंटन समिति के सदस्य भी रहे, जिसके अध्यक्ष अर्जुन सिंह थे। बांकीडोल में 200 एकड़ जमीन में 500 आदिवासियों को बसाया और वन विभाग से पट्टा भी दिलवाया था। इसके लिए 8 दिन जेल में भी रहे।