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दैत्यराज बाणासुर ने यहां की थी तपस्या, दानवों की भी साधना स्थल रही है भगवान राम की तपोस्थली

अगूढ़ तथ्यों के खोज की यात्रा १०वें दिन यमुना नदी के तट पर ऋषियन पहुंची। यहां पर 84 हजार ऋषि-मुनि तपस्या किया करते थे।

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सतना

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Suresh Mishra

Sep 18, 2017

capital of monster kingdom Banasur in Chitrakoot

capital of monster kingdom Banasur in Chitrakoot

सतना/चित्रकूट। अगूढ़ तथ्यों के खोज की यात्रा 10वें दिन यमुना नदी के तट पर ऋषियन पहुंची। यहां पर 84 हजार ऋषि-मुनि तपस्या किया करते थे। भारद्वाज मुनि के आश्रम से चलकर राम ने यहीं से चित्रकूट में प्रवेश किया था। दानव भी यहां तपस्या किया करते थे। महाभारत काल में दैत्यराज बाणासुर की राजधानी रहा यह क्षेत्र असुरों का आराधना स्थल रहा है।

यहां से कई मूर्तियां चोरी जा चुकी हैं

इस स्थान पर एक बड़ी शिला से निर्मित गुफा के अंदर अनेकों शिवलिंग हैं। पर्वत से निकलती जलधारा इन शिवलिंगों का अभिषेक करती रहती हैं। लोगों ने बताया, यहां से कई मूर्तियां चोरी जा चुकी हैं। कोटरा के इर्दगिर्द छोटी-छोटी पहाडिय़ों में से एक है सुगरिया पथरी। इस पहाड़ी पर हजारों वर्ष पूर्व आदिमानवों के बनाए गए शैल चित्र बिखरे पड़े हैं।

जानवरों के आखेट के चित्रों की भरमार

शैलचित्रों में युद्धरत योद्धाओं, विभिन्न प्रकार के आयुधों और जानवरों के आखेट के चित्रों की भरमार है। इन स्थलों पर पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। कोटरा से तीन किमी दूर चित्रकूट का अंतिम गांव है परदवां। यह भगवान कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न की राजधानी थी। यहां करीब पांच-छह फीट मोटी पत्थर की विशाल प्राचीरें नजर आती हैं।

पुरातत्व विभाग अनजान
पीने के पानी का समुचित प्रबंध ना होने, महत्वपूर्ण स्थलों के मानचित्र का अभाव, इन स्थलों तक पहुंचने और दूरी प्रदर्शित करने वाले सूचना पटों की कमी के कारण भारतीय संस्कृति की विरासत को संजोये इन स्थलों का दीदार करने आये पर्यटकों को भारी निराशा ही हाथ लगती है। पुरातत्व विभाग मात्र बोर्ड लगाकर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर रहा है।

यहां हुआ था लव का जन्म
कला और संस्कृति से चित्रकूट का पुराना नाता रहा है। इतिहास में घटनाओं के साक्षी चित्रकूट को विश्व पटल पर रखने और मानव सभ्यता की धरोहरों को यूनेस्को सहित पुरातत्व विभाग की सूची में शामिल कराने के प्रयासों के लिए की जा रही यात्रा 'अ हेरिटेज जर्नी विद संतोष बंसलÓ नौवें दिन राघव प्रपात और चर स्थित सोमनाथ मंदिर पहुंची। कभी डकैत ददुआ का सचिवालय कहा जाने वाला चमरौन्हा पर्यटन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है।

मिला भगवान सोमनाथ का प्राचीन मन्दिर
बरदहा नदी यहां से पन्ना की ओर जाती है और चट्टानों से टकराकर झरने के रूप में नीचे गिरती है। इसे राघव प्रपात कहा जाता है। यात्रा दल चित्रकूट-कर्वी से 12 किमी पूर्व कर्वी-मानिकपुर रोड के मध्यवर्ती ग्राम चर में वाल्मीकि नदी के तट पर पहाड़ी पर बने भगवान सोमनाथ के प्राचीन मन्दिर पहुंच। मन्दिर के गर्भगृह की दीवार पर एक शिलालेख है जिसमें लिखा है कि, इसका निर्माण 14वीं शताब्दी के अन्त में तत्कालीन नरेश राजाकीर्ति सिंह ने कराया है।

सौरठिया पहाड़ी में मंदिर
जिस पहाड़ी पर मन्दिर है उसे सौरठिया पहाड़ी कहते थे। सौरठिया सौराष्ट्र का अपभ्रंश है। समीप ही तत्कालीन शासकों की उपराजधानी मदनगढ़ थी। आजकल 'मदनाÓ नाम से पुकारते हैं। ध्वंशावशेष आज भी हैं। कर्वी से 14 किलोमीटर दूर गुंता और केवई नदी के बीच बसा गहोरा राजधानी रहा है। इसे देखने अरब और फारस के यात्री आया करते थे। व्याघ्रदेव ने सौराष्ट्र के सोमनाथ मन्दिर की तर्ज में चर में 'सोमनाथ मन्दिरÓ का निर्माण कराया था।

मंदिर परिसर में अवैध निर्माण
वर्तमान में मंदिर परिसर में लोगों द्वारा अवैध निर्माण कराया जा रहा है। सोमनाथ मंदिर के बाद यात्रा दल बाल्मीकि आश्रम पहुंचा। आदि कवि और रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि चित्रकूट में निवास करते थे। वनवास काल में भारद्वाज मुनि के कहने पर राम सीता और लक्ष्मण के साथ वाल्मीकि आश्रम में पहुँचे थे। उनसे वनवास व्यतीत करने के लिए उपयुक्त स्थान बताने का आग्रह किया था।

बाल्मीकि के निर्देश पर चित्रकूट में डेरा जमाया
बाल्मीकि के निर्देश पर ही उन्होंने चित्रकूट में डेरा डाला था। आनंद रामायण के अनुसार वनवास पूरा होने पर राम का राज्याभिषेक होने के बाद जब सीता का निर्वसन हुआ तो लक्ष्मण दासियों, सखियों और तुलसीदल के साथ सीता जी को रथ में बैठाकर दक्षिण मार्ग से गंगा, यमुना और मन्दाकिनी नदी पारकर बाल्मीकि आश्रम में छोड़ गए थे। सीता ने यहीं लव को जन्म दिया था।