
Emergency in india
सतना. आपातकाल यानी इमरजेंसी। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के इतिहास का वो काला अध्याय जिससे नई पीढ़ी तो अंजान है ही उस समय के गवाह लोग भी उस दौर को याद करना नहीं चाहते। बातों ही बातों में जिक्र भी होने पर उनकी आंखों के सामने इमरजेंसी का खतरनाक मंजर मानो एक बार फिर जीवंत हो जाता है। बताते-बताते लोग सिहर उठते हैं। नागरिक अधिकार तो समाप्त हुए ही थे, मीडिया और अन्य संचार माध्यमों पर भी सरकार ने पाबंदी लगा दी थी। तब प्रतिबंध सतना से प्रकाशित दो समाचार पत्रों पर भी लगा था और उनके मालिक-सम्पादक जेल भेज दिए गए थे। आपातकाल प्रभावी होने की तारीख यानी 25 जून हर साल मीसाबंदियों और उनके परिवार जनों के जख्मों को ताजा कर जाती है।
लोकतंत्र की हुई थी हत्या
मीसा के तहत जेल भेजे गए स्व छकौड़ी लाल अग्रवाल के पुत्र एवं भाजपा प्रवक्ता राजेंद्र अग्रवाल ने बताया कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में आपातकाल की तरह या यूं कह सकते हैं कि लोकतंत्र की हत्या का दूसरा उदाहरण फिर कभी इस देश में नहीं बना। आपातकाल में सबसे ज्यादा अखरने वाली बात जो थी वह थी लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर प्रतिबंध लगाकर उसे कमजोर कर देना।
अखबार, रेडियो और टीवी पर सेंसर लग गया। सरकार के खिलाफ कुछ छप नहीं सकता था, मौलिक अधिकार समाप्त हो चुके थे तथा सरकार विरोधी समाचार छापने वाले अखबारों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया था।
सतना के भी दो अखबार हुए थे प्रतिबंधित
पूरे देश के साथ-साथ सतना के भी दो समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगाया गया था। म. प्र. राजपत्र क्र. 110 भोपाल दिनांक 26 जून 1975 को प्रकाशित अधिसूचना में शासन ने म. प्र. सिक्यूरिटी एक्ट, 1959 की धारा 12 उपधारा 1 के उपखण्ड दो के अंतर्गत समाचार पत्रों के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगाया। सतना से प्रकाशित दैनिक सतना समाचार को अधिसूचना क्र. 41/13/75 क्ष. (असाधार राजपत्र) दिनांक 26 जून 1975 द्वारा प्रतिबंधित कर सम्पादक छकौड़ी लाल अग्रवाल को जेल भेज दिया गया। उनके भाई आनंद अग्रवाल को भी जेल भेजा गया और उनके अखबार जवान भारत पर भी पाबंदी लगा दी गई। इसके अलावा भी मप्र के कई अन्य समाचार पत्रों को प्रतिबंध का सामना करना पड़ा
आधी रात छीनी थी आजादी
25 और 26 जून की दरमियानी रात राष्ट्रपति ने आपातकाल के आदेश पर हस्ताक्षर किए और उसी समय आपातकाल लागू हो गया। यानी पूरे देश में सत्ता पर काबिज लोगों ने आम जनता की आवाज को कुचलने की निरंकुश कोशिश की। भारतीय संविधान की धारा 352 का खुला दुरुपयोग शुरू हो गया। यह सब कुछ 19 माह तक उसी तरह चलता रहा जैसा तत्कालीन केंद्र सरकार चाहती रही और फिर इंदिरा गांधी ने 18 जनवरी 1977 को लोस चुनाव कराने की घोषणा कर दी, मीडिया की स्वतंत्रता बहाल हो गई। जनसंघ के नेतृत्व में देश भर के तमाम दलों के गठबंधन की जनता पार्टी को 16 मार्च 1977 को सम्पन्न लोकसभा चुनावों में कामयाबी मिलने के बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व में स्वतंत्र भारत की पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी। मीसाबंदियों की रिहाई हुई और नागरिक अधिकार बहाल हुए।
Published on:
26 Jun 2018 06:12 pm
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