
अयोध्या राम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा संपन्न हो चुकी है। अपने घर अयोध्या के साथ ही देश के हर घर में राम आए हैं...। इस ऐतिहासिक और गौरवान्वित करने वाले पल ने भगवान श्रीराम के जीवन की सच्ची घटनाओं की कहानियां, किस्से और वनवास के दिनों की यादों को पंख दे दिए। सोशल मीडिया से लेकर सामान्य लाइफ राममय हो चली है। घरों में बच्चों को श्रीराम के जन्म से लेकर राजा बनने, वनवास जाने और मर्यादापुरुषोत्तम कहलाने की वजह बताई जा रही है। एक राजा के तपस्वी जीवन की कहानी हमने भी सुनी है, जो बताती है मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक पन्नों में धार्मिक महत्व के ऐसे कई स्थान हैं, जहां भगवान श्रीराम ने सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास के साढ़े ग्यारह साल बिताए। त्रेता युग में यहां के जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में वनवासी जीवन बिताया...किंवदंतियां, माता सीता की रसोई से लेकर भगवान श्रीराम के लिए खाना परोसने वाली नदी की कहानियां...चित्रकूट में इसके निशान भी मिले हैं, जो बताते हैं अयोध्या जन्मभूमि तो चित्रकूट श्रीराम की कर्मभूमि है...
ये तस्वीरें चित्रकूट के स्वामी कामता नाथ (कामदगिरि) की है। किंवदंती है कि भगवान श्रीराम ने चित्रकूट के इस पर्वत पर वनवास के साढ़े 11 वर्ष बिताए। और जब भगवान राम चित्रकूट छोड़ने का निर्णय लिया, तब ये पर्वत बहुत दु:खी हो गया। मान्यता है कि वनवासी श्रीराम इस पर्वत पर रहकर ही वे मर्यादापुरुषोत्तम बने...भगवान राम की तपोभूमि चित्रकूट अनादि काल से वाल्मीकि समेत तमाम महान ऋषि-मुनियों की तपोस्थली रही। त्रेता युग में जब अयोध्या नरेश राजा दशरथ के पुत्र भगवान श्रीराम पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण सहित 14 वर्ष के वनवास के लिए निकले थे। तब वे आदि ऋषि वाल्मीकि की प्रेरणा से तप और साधना के लिए चित्रकूट आए थे। भगवान राम ने सीता और लक्ष्मण के साथ पावन चित्रकूटगिरी पर वनवास का साढ़े 11 वर्ष का लंबा समय बिताया था।
व्याकुल श्रीराम ने दिया था वरदान
पर्वत की व्यथा से व्याकुल श्रीराम ने कामथा नाथ (कामदगिरी) पर्वत को वरदान देते हुए कहा कि अब आप कामद हो जाएंगे। जो भी आपकी परिक्रमा करेगा, उसकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाएंगी। परिक्रमा करने वाले पर हमारी कृपा भी बनी रहेगी। तब से आज तक इस पर्वत को भगवान श्रीराम का स्वरूप ही माना जाता है।
सैकड़ों साल पहले यहां बना था मंदिर
मंदाकिनी नदी के घाट के ठीक ऊपर आज भी पर्णकुटी है। यहां के पुजारी बच्चू महाराज बताते हैं कि वर्तमान में जो मंदिर है वह 773 साल पुराना है। पहले यहां पर्णकुटी हुआ करती थी। यहां मौजूद यज्ञ वेदी के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम के यहां पहुंचने से पहले ब्रह्माजी ने यज्ञ किया था। प्रभु श्रीराम यहीं रहते थे। इससे लगे वन्य क्षेत्र में ऋषि-मुनियों के आश्रमों में जाते थे और उनका संरक्षण भी करते थे।
ये हैं वो जगह जो कहती हैं श्रीराम की कथाएं
- टाठी या थाली घाट
मान्यता है कि मंदाकिनी नदी श्रीराम को भोजन परोसती थी और खाना ग्रहण करते ही थाली खुद ही लौट जाती थी।
सीता की रसोई और राम शैल
इन दोनों ही स्थलों का वर्णन रामायण में नहीं मिलता। लेकिन लोक मान्यता है कि सीता रसोई वह स्थल है, जहां प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण ने रात्रि विश्राम किया था। यहां आज मंदिर स्थापित है। मंदिर के पास ही चट्टानों में सीता रसोई है, जहां वनवासी पूजा करते हैं और मनौती मांगने आते हैं। जबकि रामशैल सीता रसोई से 4 किमी दूर एक पर्वत है, जिसे आज लेड़हरा पहाड़ के नाम से जाना जाता है। लेकिन पहले इसे रामशैल पर्वत के नाम से जाना जाता था। वनवासियों के लिए यह पर्वत पूज्यनीय है और यहां प्रभु श्रीराम के चरण चिह्न हैं। यहां पर एक जल कुंड भी है।
ये भी हैं चित्रकूट के वे स्थल जहां रुके थे श्रीराम
रामघाट, सरभंग आश्रम, गुप्त गोदावरी, स्फटिक शिला, सिद्धा पहाड़, अश्वमुखी मंदिर, सुतीक्ष्ण आश्रम,शिवमंदिर मैहर, मार्कण्डेय आश्रम
400 करोड़ से दमकेगी श्रीराम की ये कर्म भूमि
राम वन गमन पथ भाजपा सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने चित्रकूट विकास के लिए 400 करोड़ रुपए खर्च करने के निर्देश अधिकारियों को दिए हैं। रामायण में उल्लेखित वे स्थल जहां राम की मौजूदगी साबित हो रही है। उन्हें भी विकसित किया जाएगा। पर्यटक यहां पहुंच कर राम की स्मृतियों को साकार रूप में देख सकेंगे। इससे रोजगार और राजस्व दोनों बढ़ेंगे।
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पढ़ें कामदगिरि की पूरी कथा
विश्व के विलक्षण पर्वत कामदगिरि प्रमुख द्वार के महंत मदन गोपाल दास महाराज बताते हैं कि चित्रकूट का कामदगिरि पर्वत विश्व का वह पावन धाम हैं। जहां भगवान विष्णु ने भगवान राम के रूप में वनवास काटा था, सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा ने यज्ञ किया था, उस यज्ञ से प्रगट हुआ शिवलिंग धर्मनगरी चित्रकूट के क्षेत्रपाल के रूप में आज भी विराजमान है। ऐसी मान्यता है कि प्रभु राम पत्नी और अनुज लक्ष्मण के साथ नित्य निवास करते हैं। इसी पर्वत पर तप और साधना कर प्रभु राम ने आसुरी ताकतों से लड़ने की दिव्य शक्तियां प्राप्त की थीं। कहा जाता है कि जब भगवान राम चित्रकूट को छोड़कर जाने लगे तो चित्रकूट गिरी ने भगवान राम से याचना कि, हे प्रभु आपने इतने वर्षों तक यहां वास किया, जिससे ये जगह पावन हो गई। लेकिन आपके जाने के बाद मुझे कौन पूछेगा। तब प्रभु राम ने चित्रकूटगिरि को वरदान दिया कि अब आप कामद हो जाएंगे। यानि इच्छाओं (मनोकामनाओं) की पूर्ति करने वाले हो जाएंगे। जो भी आपकी शरण में आएगा उसके सारे विशाद नष्ट होने के साथ-साथ सारी मनोकामना पूर्ण हो जाएंगी और उस पर सदैव राम की कृपा बनी रहेगी। जैसे प्रभु राम ने चित्रकूट गिरि को अपनी कृपा का पात्र बनाया कामदगिरी पर्वत कामतानाथ बन गए। इस अलौकिक पर्वत की महिमा गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में भी की हैं। उन्होंने लिखा है 'कामदगिरि भे रामप्रसादा, अवलोकत अप हरत विषादा'। यानी जो भी इस पर्वत के दर्शन करेगा उसके सारे कष्ट दूर हो जाएंगे।
Updated on:
25 Jan 2024 03:42 pm
Published on:
25 Jan 2024 12:27 pm
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